नारी सम्मान की पुकार में विपक्ष की पराजय और संघर्ष में भी विजय का विश्वास
नारी सम्मान की पुकार में विपक्ष की पराजय और संघर्ष में भी विजय का विश्वास
देश की राजनीति के वर्तमान दौर में महिला आरक्षण और परिसीमन का मुद्दा केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं बल्कि जनभावनाओं और राजनीतिक दृष्टिकोण का आईना बनकर सामने आया है इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कौन वास्तव में नारी सशक्तिकरण के साथ खड़ा है और कौन इस विषय को केवल राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रहा है। संसद में जो कुछ हुआ और उसके बाद जिस प्रकार से बयानबाजी और रणनीतियां सामने आईं उसने लोकतंत्र की परिपक्वता और दलों की मंशा दोनों को उजागर कर दिया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस पीड़ा और प्रतिबद्धता के साथ देश को संबोधित किया वह केवल एक नेता का वक्तव्य नहीं बल्कि एक जिम्मेदार नेतृत्व का संकेत था। उन्होंने यह स्वीकार किया कि महिला आरक्षण विधेयक पारित न हो पाने का उन्हें दुख है, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह संघर्ष यहीं समाप्त नहीं होगा बल्कि और अधिक दृढ़ता के साथ आगे बढ़ेगा यह दृष्टिकोण जनता के भीतर विश्वास पैदा करता है कि प्रयास सच्चे हैं और दिशा स्पष्ट है।
विपक्षी खेमे मेराहुल,प्रियंका और सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे जैसे नेताओं की बैठकों और प्रेस वार्ताओं ने यह दर्शाया कि वे इस मुद्दे को जनहित की बजाय राजनीतिक अवसर के रूप में अधिक देख रहे हैं ।महिला आरक्षण जैसे संवेदनशील विषय पर स्पष्ट और ठोस समर्थन देने के बजाय उन्होंने शर्तों और संशोधनों की बात कर अपने रुख को कमजोर किया है। यह जनता के सामने उनकी प्राथमिकताओं को उजागर करता है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि विपक्ष अब यह कह रहा है कि पुराने विधेयक को वर्तमान सीटों पर लागू किया जाए लेकिन जब अवसर था तब उन्होंने उसी विधेयक को समर्थन क्यों नहीं दिया। यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है। जनता इस विरोधाभास को भलीभांति समझ रही है और यह स्थिति विपक्ष की विश्वसनीयता को कमजोर करती है।
परिसीमन के मुद्दे पर भी जिस प्रकार से भ्रम फैलाने की कोशिश की गई वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के साथ न्याय नहीं है यह एक संवैधानिक व्यवस्था है जिसका उद्देश्य प्रतिनिधित्व को संतुलित करना है। लेकिन इसे क्षेत्रीय असंतुलन और राजनीतिक नुकसान के रूप में प्रस्तुत करना केवल जनता को भ्रमित करने का प्रयास प्रतीत होता है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने वक्तव्य में इस भ्रम को दूर करने का प्रयास किया और यह स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया सभी राज्यों के लिए समान रूप से लागू होती है।
इस पूरे घटनाक्रम में भाजपा और एनडीए की रणनीति अधिक स्पष्ट और संगठित दिखाई देती है जहां एक ओर वे संसद में अपने प्रयासों के माध्यम से विधेयक को पारित कराने की कोशिश कर रहे थे। वहीं दूसरी ओर अब वे जनता के बीच जाकर इस विषय को समझाने का संकल्प ले रहे हैं। यह सक्रियता और आत्मविश्वास यह दर्शाता है कि वे इस मुद्दे को केवल राजनीतिक लाभ के लिए नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन के रूप में देखते हैं।
विपक्ष द्वारा देशभर में अभियान चलाने और सरकार के खिलाफ वातावरण बनाने की बात यह दर्शाती है कि वे संसद में अपनी भूमिका को प्रभावी ढंग से निभाने में असफल रहे अब वे सड़कों पर संघर्ष के माध्यम से अपनी स्थिति को मजबूत करने का प्रयास कर रहे हैं ,लेकिन आज की जागरूक जनता केवल नारों और आरोपों से प्रभावित नहीं होती वह कार्य और नीयत दोनों को परखती है।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में जिस प्रकार से परिवारवाद और स्वार्थी राजनीति का उल्लेख किया वह भारतीय राजनीति की एक पुरानी समस्या की ओर संकेत करता है ।जब निर्णय समाज के व्यापक हित की बजाय कुछ परिवारों के हित में लिए जाते हैं, तब विकास और समान अवसर बाधित होते हैं ।महिला आरक्षण जैसे विषय ऐसे ढांचे के लिए चुनौती बनते हैं क्योंकि यह नई नेतृत्व क्षमता को जन्म देता है और सत्ता के केंद्रीकरण को तोड़ता है।
इस पूरे प्रकरण ने यह भी स्पष्ट किया है कि आज की नारी केवल दर्शक नहीं है वह सक्रिय रूप से राजनीति और समाज को समझ रही है। वह यह देख रही है कि कौन उसके अधिकारों के लिए ईमानदारी से प्रयास कर रहा है और कौन केवल दिखावे की राजनीति कर रहा है। यह जागरूकता भविष्य के राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित करेगी।
कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के लिए यह स्थिति एक बड़ी राजनीतिक चुनौती के रूप में सामने आई है ।उनकी रणनीति में स्पष्टता की कमी और उनके बयानों में विरोधाभास ने उन्हें कमजोर स्थिति में ला खड़ा किया है ।यह कहना गलत नहीं होगा कि इस मुद्दे पर उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा है यह हार केवल संसद में नहीं बल्कि जनमानस में भी दिखाई दे रही है।
दूसरी ओर एनडीए के लिए यह एक अलग प्रकार की स्थिति है, जहां विधेयक पारित न हो पाने के बावजूद उन्होंने नैतिक और वैचारिक स्तर पर एक मजबूत स्थान प्राप्त किया है। यह वह स्थिति है जहां संघर्ष में भी जीत का अनुभव होता है। क्योंकि उद्देश्य स्पष्ट और प्रयास निरंतर हैं जनता इस अंतर को समझती है और यही समझ भविष्य में उनके समर्थन का आधार बन सकती है।
यह समय सभी राजनीतिक दलों के लिए आत्ममंथन का है लेकिन विशेष रूप से विपक्ष के लिए यह आवश्यक है कि वह केवल विरोध की राजनीति से आगे बढ़े और राष्ट्रीय मुद्दों पर सकारात्मक भूमिका निभाए अन्यथा वह जनता का विश्वास खोता जाएगा।
अंततः यह कहा जा सकता है कि महिला आरक्षण और परिसीमन का यह पूरा घटनाक्रम भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण अध्याय बन गया है ।इसमें जहां एक ओर विपक्ष की कमजोरियां उजागर हुई हैं वहीं दूसरी ओर एनडीए की दृढ़ता और संकल्प सामने आया है। यह संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है लेकिन जो संकेत मिल रहे हैं वे यह बताते हैं कि जनता अब अधिक सजग है और वह सही समय पर सही निर्णय लेने के लिए तैयार है। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है और यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष भी है।
कांतिलाल मांडोत
दीदार ए हिन्द की रीपोर्ट