अमेरिकन ड्रीम से भारतीयों का मोह भंग! 40% से ज्यादा छोड़ना चाहते हैं US, Carnegie Survey के खुलासे मचा हड़कंप

अमेरिकन ड्रीम से भारतीयों का मोह भंग! 40% से ज्यादा छोड़ना चाहते हैं US, Carnegie Survey के खुलासे मचा हड़कंप

अमेरिका, कार्नेगी एंडोमेंट की 2026 रिपोर्ट के अनुसार 40% भारतीय-अमेरिकी अमेरिका छोड़ने पर विचार कर रहे हैं; राजनीतिक ध्रुवीकरण जटिल वीजा नियमों से लोग परेशान है।

दुनियाभर के लोगों और खासकर भारतीयों के लिए अमेरिका हमेशा से ही ड्रीमलैंड की तरह रहा है। अच्छी नौकरी, ज्यादा कमाई और बेहतर लाइफस्टाइल ये वो बुनियादी चीजें थी जिसके चलते भारतीय पेशेवरों की पहली पसंद के तौरपर अमेरिका की अलग ही जगह रही। लेकिन कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस की 2026 रिपोर्ट के अनुसार, अब 40% भारतीय-अमेरिकी अब अमेरिका छोड़ने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं।

यह आंकड़ा न सिर्फ चौंकाने वाला है, बल्कि उस समुदाय के भीतर बढ़ते असंतोष को भी दिखाता है जिसे लंबे समय तक अमेरिका की “सबसे सफल माइनॉरिटी” माना जाता रहा है। आज अमेरिका में भारतीय समुदाय के लोग मेयर लेकर मंत्री जैसे बड़े पदों पर है। ऐसे में सवाल उठता है कि, जो लोग कल तक अमेरिका की अर्थव्यवस्था को चलाने में अहम भूमिका निभाते हैं वो अचानक उस देश को छोड़कर क्यों जाने के बारे में सोच रहे हैं।

लगातार बिगड़ता राजनीतिक माहौल
रिपोर्ट के मुताबिक, इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह राजनीतिक माहौल में आया बदलाव है। डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान बढ़ते ध्रुवीकरण और नीतिगत सख्ती ने कई प्रवासी भारतीयों में असहजता बढ़ाई है। करीब 58% लोगों ने राजनीतिक वातावरण को मुख्य कारण बताया, जबकि बड़ी संख्या में लोगों ने यह भी कहा कि उन्हें अब पहले जैसी “अपनेपन” और समावेश की भावना नहीं मिलती।

जटिल इमिग्रेशन सिस्टम और लंबा इंतजार
इसके अलावा इमिग्रेशन सिस्टम की जटिलताएं भी एक बड़ी वजह बनकर सामने आई हैं। H-1B वीजा की अनिश्चितता और ग्रीन कार्ड के लिए दशकों लंबा इंतजार कई मामलों में 30 से 40 साल तक ने लोगों के धैर्य की परीक्षा ले ली है। कुछ रिपोर्ट्स में तो यह भी कहा गया है कि अलग-अलग कैटेगरी में यह प्रतीक्षा 70 साल तक पहुंच सकती है, जिससे कई परिवार स्थाई रूप से बसने की उम्मीद खोते जा रहे हैं।

तेजी से बढ़ रहा आर्थिक दबाव
इसके साथ ही आर्थिक दबाव भी तेजी से बढ़ा है। अमेरिका में घरों की कीमतें, बच्चों की शिक्षा, हेल्थकेयर और चाइल्डकेयर का खर्च इतना अधिक है कि मध्यम वर्गीय भारतीय परिवारों के लिए वहां टिके रहना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। बड़े शहरों जैसे सैन फ्रांसिस्को, न्यूयॉर्क और सिएटल में किराए और जीवन-यापन की लागत आमदनी का बड़ा हिस्सा खा जाती है।

सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल
सुरक्षा और सामाजिक माहौल को लेकर चिंताएं भी सामने आई हैं। हालांकि बड़े पैमाने पर हिंसा या भेदभाव के मामलों में कोई तेज वृद्धि नहीं हुई है, लेकिन कई लोग “बौद्धिक भेदभाव” और असहजता की भावना को महसूस करने की बात करते हैं। यह भी एक कारण है कि कुछ भारतीय अब खुद को वहां पूरी तरह स्थाई रूप से स्थापित महसूस नहीं कर पा रहे हैं।

भारत की तेज आर्थिक वृद्धि
दूसरी तरफ, भारत की तेज आर्थिक वृद्धि और टेक सेक्टर में उभरते अवसर भी इस सोच को प्रभावित कर रहे हैं। बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे शहर अब ग्लोबल टेक हब बन चुके हैं, जहां समान अवसर, बेहतर लाइफस्टाइल और परिवार के साथ रहने की सुविधा मिल रही है। यही कारण है कि “रिवर्स माइग्रेशन” यानी भारत लौटने की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है।

दूसरे देशों में बसने का विकल्प
हालांकि, अमेरिका छोड़ने का मतलब हमेशा भारत वापसी नहीं है। कई लोग कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और दुबई जैसे देशों की ओर भी देख रहे हैं, जहां इमिग्रेशन नियम अपेक्षाकृत सरल हैं और नागरिकता पाने की प्रक्रिया तेज मानी जाती है।

कुल मिलाकर यह स्थिति सिर्फ एक सर्वे का नतीजा नहीं, बल्कि उस बड़े बदलाव का संकेत है जिसमें एक समय पर “अमेरिकन ड्रीम” को सबसे बड़ा लक्ष्य मानने वाला समुदाय अब अपनी प्राथमिकताओं को फिर से परिभाषित कर रहा है जहां नौकरी और डॉलर के साथ-साथ स्थिरता, सुरक्षा और जीवन की गुणवत्ता भी उतनी ही अहम हो गई है।

दीदार ए हिन्द की रीपोर्ट

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