राष्ट्रीय युवा दिवस व स्वामी विवेकानंद जयंती (12 जनवरी) पर विशेष: युवा शक्ति के प्रेरणा पुंज है स्वामी विवेकानंद

राष्ट्रीय युवा दिवस व स्वामी विवेकानंद जयंती (12 जनवरी) पर विशेष: युवा शक्ति के प्रेरणा पुंज है स्वामी विवेकानंद

-हर्षवर्धन पान्डे-

विवेकानन्द जिन्हें उस दौर में नरेन्द्रनाथ नाम से पुकारा जाता था एक ऐसा नाम है जिन्होंने करिश्माई व्यक्तित्व के किरदार को एक दौर में जिया। आज भी लोग गर्व से उनका नाम लेते हैं और युवा दिलों में वह एक आयकन की भांति बसते हैं। इतिहास के पन्नों में विवेकानंद का दर्शन उन्हें एक ऐसे महाज्ञानी व्यक्तित्व के रूप में जगह देता है जिसने अपने ओजस्वी विचारों के द्वारा दुनिया के पटल पर भारत का नाम बुलंदियों के शिखर पर पहुँचाया। उनके द्वारा दिया गया वेदान्त दर्शन भारतीय दर्शन की एक अनमोल धरोहर है। अपने गुरु के नाम पर विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन तथा रामकृष्ण मठ की स्थापना की। विश्व में भारतीय दर्शन विशेषकर वेदांत और योग को प्रसारित करने में विवेकानंद की महत्वपूर्ण भूमिका है, साथ ही ब्रिटिश भारत के दौरान राष्ट्रवाद को अध्यात्म से जोड़ने में इनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। परमहंस जी जैसे जौहरी ने रत्न को परखा। उन दिव्य महापुरुष के स्पर्श ने नरेन्द्र को बदल दिया। इसी समय उनकी भेंट अपने गुरु रामकृष्ण से हुई, जिन्होंने पहले उन्हें विश्वास दिलाया कि ईश्वर वास्तव में है और मनुष्य ईश्वर को पा सकता है। रामकृष्ण ने सर्वव्यापी परमसत्य के रूप में ईश्वर की सर्वोच्च अनुभूति पाने में नरेंद्र का मार्गदर्शन किया और उन्हें शिक्षा दी कि सेवा कभी दान नहीं, बल्कि सारी मानवता में निहित ईश्वर की सचेतन आराधना होनी चाहिए। यह उपदेश विवेकानंद के जीवन का प्रमुख दर्शन बन गया। 25 वर्ष की अवस्था में नरेन्द्रदत्त ने भगवा वस्त्र को धारण किया। अपने गुरु से प्रेरित होकर नरेंद्रनाथ ने सन्यासी जीवन बिताने की दीक्षा ली और स्वामी विवेकानंद के रूप में दुनिया में जाने गए।

स्वामी विवेकानन्द ने वहाँ भारत और हिन्दू धर्म की भव्यता स्थापित करके ज़बरदस्त प्रभाव छोड़ा। 11 सितम्बर 1893 का दिन इतिहास में अमर है। इस दिन अमेरिका में विश्व धर्म सम्मलेन का आयोजन किया जिसमे दुनिया के कोने कोने से लोगो ने शिरकत की। उस दौर में भारत के प्रतिनिधित्व की जिम्मेदारी इन्ही के कंधो पर थी। गेरुए कपडे पहने विवेकानन्द ने अपनी वाणी से वहां पर मौजूद जनसमुदाय को मंत्र मुग्ध कर दिया। जहाँ सभी अपना भाषण लिखकर लाये थे वहीँ विवेकानंद ने अपना मौखिक भाषण दिया। दिल से जो निकला वही बोला और जनसमुदाय के अंतर्मन को मानो झंकृत ही कर डाला। उनके शालीन अंदाज ने लोगों को उन्हें सुनने को मजबूर कर दिया। धर्म की व्याख्या करते हुए वह बोले जैसे सभी नदियां अंत में समुद्र में जाकर मिलती है वैसे ही दुनिया में अलग अलग धर्म अपनाने वाले मनुष्य को एक न एक दिन ईश्वर की शरण में जाकर ही लौटना पड़ता है। सिस्टर्स ऐंड ब्रदर्स ऑफ़ अमेरिका के संबोधन के साथ अपने भाषण की शुरुआत करते ही 7000 प्रतिनिधियों ने तालियों के साथ उनका स्वागत किया। 17 सितम्बर 1893 को शिकागो में धर्म सभा में उन्होंने भारत को हिन्दू राष्ट्र के नाम से सम्बोधित किया और स्वयं के हिन्दू होने पर गर्व महसूस किया। उन्होंने सभा को बताया हिन्दू धर्म पर प्रबंध ही हिन्दुत्व की राष्ट्रीय परिभाषा है। इसे समझने पर हमें हमारे विशाल देश की बाहरी विविधता में एकता के दर्शन होते हैं। शिकागो से वापसी पर उन्होंने कहा केवल अंध देख नहीं पाते और विक्षिप्त बुद्धि समझ नहीं पाते कि यह सोया देश अब जाग उठा है। अपने पूर्व गौरव को प्राप्त करने के लिए इसे अब कोई नहीं रोक सकता। उन्होंने सभी हिन्दुओं को सब भेदों से ऊपर उठकर अपनी राष्ट्रीय पहचान पर गर्व करने का ककहरा ना केवल सुनाया बल्कि दुनिया में भारत के नाम के झंडे गाड़ दिए। विवेकानंद ने वहाँ एकत्र लोगों को सभी मानवों की अनिवार्य दिव्यता के प्राचीन वेदांतिक संदेश और सभी धर्मों में निहित एकता से परिचित कराया। शिकागो में दिये गए उनके व्याख्यानों से एक नए अभियान की शुरुआत हुई जो सुधार के उद्देश्य से आज भी हर किसी के दिल में बसा है। उन्होंने न्यूयॉर्क में लगभग दो वर्ष व्यतीत किये जहाँ वर्ष 1894 में पहली ‘वेदांत सोसाइटी’ की स्थापना की। उन्होंने पूरे यूरोप का व्यापक भ्रमण किया तथा मैक्स मूलर और पॉल डूसन जैसे मनीषियों से संवाद किया साथ ही भारत में अपने सुधारवादी अभियान के आरंभ से पहले निकोला टेस्ला जैसे प्रख्यात वैज्ञानिकों के साथ तर्क-वितर्क भी किये।

विवेकानंद का विचार है कि सभी धर्म एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं, जो उनके आध्यात्मिक गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस के आध्यात्मिक प्रयोगों पर आधारित है। परमहंस रहस्यवाद के इतिहास में अद्वितीय स्थान रखते हैं, जिनके आध्यात्मिक अभ्यासों में यह विश्वास निहित है कि सगुण और निर्गुण की अवधारणा के साथ ही ईसाईयत और इस्लाम के आध्यात्मिक अभ्यास आदि सभी एक ही बोध या जागृति की ओर ले जाते हैं। शिकागो के अपने प्रवास के दौरान स्वामी विवेकानंद ने तीन चीजों पर जोर दिया। पहला, उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा न केवल सहिष्णुता बल्कि सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करने में विश्वास रखती है। दूसरा, उन्होंने स्पष्ट और मुखर शब्दों में इस बात पर बल दिया कि बौद्ध धर्म के बिना हिंदू धर्म और हिंदू धर्म के बिना बौद्ध धर्मं अपूर्ण है। तीसरा, यदि कोई व्यक्ति केवल अपने धर्म के अनन्य अस्तित्व और दूसरों के धर्म के विनाश का स्वप्न रखता है तो मैं ह्रदय की अतल गहराइयों से उसे दया भाव से देखता हूँ और उसे इंगित करता हूँ कि विरोध के बावजूद प्रत्येक धर्म के झंडे पर जल्द ही संघर्ष के बदले सहयोग, विनाश के बदले सम्मिलन और मतभेद के बजाय सद्भाव व शांति का संदेश लिखा होगा।

जिस समय शिकागो में 1893 में धर्म सम्मेलन हुआ, उस समय पाश्चात्य जगत भारत को हीन दृष्टि से देखता था। वहां के लोगों ने बहुत प्रयास किया कि विवेकानंद को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का समय ही ना मिले, मगर एक अमेरिकी प्रोफ़ेसर के प्रयास से उन्हें थोडा समय मिला। भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जायेगा कहकर स्वामी जी ने पुन: भारत को विश्व गुरु पद पर प्रतिष्ठित कर दिया। गुरुदेव रविंदर नाथ टैगोर ने विवेकानन्द के बारे में कहा है यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानंद को पढ़िए। उन्होंने सनातन धर्म को गतिशील तथा व्यावहारिक बनाया और सुदृढ़ सभ्यता के निर्माण के लिए आधुनिक मानव से विज्ञान व भौतिकवाद को भारत की आध्यात्मिक संस्कृति से जोड़ने किया शायद यही वजह है भारत में स्वामी विवेकानंद के जन्म दिवस 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

स्वामी विवेकानंद का मानना है कि भारत की खोई हुई प्रतिष्ठा तथा सम्मान को शिक्षा द्वारा ही वापस लाया जा सकता है। किसी देश की योग्यता तथा क्षमता में वृद्धि उस देश के नागरिकों के मध्य व्याप्त शिक्षा के स्तर से ही हो सकती है। स्वामी विवेकानंद ने ऐसी शिक्षा पर बल दिया जिसके माध्यम से विद्यार्थी की आत्मोन्नति हो और जो उसके चरित्र निर्माण में सहायक हो सके। साथ ही शिक्षा ऐसी होनी चाहिये जिसमें विद्यार्थी ज्ञान प्राप्ति में आत्मनिर्भर तथा चुनौतियों से निपटने में स्वयं सक्षम हों। विवेकानंद ऐसी शिक्षा पद्धति के घोर विरोधी थे जिसमें गरीबों एवं वंचित वर्गों के लिये स्थान नहीं था। स्वामी विवेकानंद की ओजस्वी वाणी भारत में तब उम्मीद की किरण लेकर आई जब हम अंग्रेजों के जुल्म सह रहे थे। हर तरफ निराशा का माहौल देखा जा सकता था। उन्होंने भारत के सोए हुए जनमानस को जगाया और उनमें नई उमंग का संचार किया। विवेकानंद वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बहुत महत्व देते थे। वह शिक्षा और ज्ञान को आस्था की कुंजी मानते हैं। विवेकानंद ने गरीबी को ईश्वर से जोडकर दरिद्रनारायण की अवधारणा दी ताकि इससे लोगों को वंचित वर्गों की सेवा के प्रति जागरूक किया जा सके और उनकी स्थिति में सुधार करने हेतु प्रेरित किया जा सके। महात्मा गांधी द्वारा सामाजिक रूप से शोषित लोगों को हरिजन शब्द से संबोधित किये जाने के वर्षों पहले ही स्वामी विवेकानंद ने दरिद्र नारायण शब्द का प्रयोग किया था जिसका आशय था कि गरीबों की सेवा ही ईश्वर की सेवा है। ‘।

स्वामी विवेकानंद के उपदेशात्मक वचनों में कहते थे “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। ”इसके माध्यम से उन्होंने देशवासियों को अंधकार से बाहर निकलकर ज्ञानार्जन की प्रेरणा दी थी। स्वामी विवेकानंद ने बार-बार कहा कि भारत के पतन का कारण धर्म नहीं है अपितु धर्म के मार्ग से दूर जाने के कारण ही भारत का पतन हुआ है जब जब हम धर्म को भूल गए तभी हमारा पतन हुआ है और धर्म के जागरण से ही हम पुनः नवोत्थान की और बढे हैं | वहीँ 1900 की शुरुआत में सेन फ्रांसिस्को में भी इसकी एक शाखा खोली।

विवेकानन्द के द्वारा दिया गया वेदान्त दर्शन एक अनमोल धरोहर है। वेदांत दर्शन उपनिषद् पर आधारित है। इसमें उपनिषद् की व्याख्या की गई है। स्वामी विवेकानंद ने अनिवार्य रूप से शिक्षा में गीता, उपनिषद और वेद में निहित नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों के समावेश की आवश्यकता पर बल दिया। उनके लिए धर्म, कर्मकांड अथवा धार्मिक रीति -रिवाज नहीं बल्कि समस्त मानव जाति के लिए आत्मज्ञान तथा आत्मबोध का कारक है। उन्होंने कहा कि बलवान शरीर और मजबूत पुट्ठोँ से युवा वर्ग गीता को भी बेहतर ढंग से समझ सकेगा। विवेकानन्द को आज हम इस रूप में याद करे कि उनके द्वारा दिया गया दर्शन हम अपने में आत्मसात करें, साथ ही अपने जीवन में कर्म को प्रधानता दें तो कुछ बात बनेगीं। बेहतर होगा युवा पीढ़ी उनके विचारों से कुछ सीखे और उनको आयकन बनाने के बजाए उनकी शिक्षा को अपने में उतारे और प्रगति पथ पर चले।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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