राष्ट्रीय युवा दिवस व स्वामी विवेकानंद जयंती (12 जनवरी) पर विशेष: वेदांत से युवा शक्ति का अभ्युदय और स्वामी विवेकानंद का कालजयी दर्शन
राष्ट्रीय युवा दिवस व स्वामी विवेकानंद जयंती (12 जनवरी) पर विशेष: वेदांत से युवा शक्ति का अभ्युदय और स्वामी विवेकानंद का कालजयी दर्शन
-दिलीप कुमार पाठक-

भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना को वैश्विक पटल पर गौरवान्वित करने वाले युगपुरुष स्वामी विवेकानंद की जयंती, 12 जनवरी, देश के इतिहास में केवल एक तिथि नहीं बल्कि एक ऊर्जावान उत्सव है। जिसे हम राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाते हैं, वह वास्तव में उस महामानव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है जिसने सोए हुए भारत को उसकी अंतर्निहित शक्तियों से परिचित कराया। विवेकानंद ने जिस वेदांत दर्शन की व्याख्या की, वह हिमालय की गुफाओं तक सीमित रहने वाला शुष्क ज्ञान नहीं था, बल्कि वह एक व्यावहारिक वेदांत था जो खेत-खलिहानों, कारखानों और युवाओं के अंतर्मन में क्रांति लाने का सामर्थ्य रखता था। उन्होंने शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में जब मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों कहकर संबोधन शुरू किया, तो वह केवल शब्द नहीं थे, बल्कि अद्वैत वेदांत की वह अनुभूति थी जो पूरी सृष्टि को एक परिवार मानती है। उनके दर्शन का मूल आधार यह था कि प्रत्येक आत्मा दिव्य है और मनुष्य की कमजोरी केवल एक भ्रम है। उन्होंने निर्भीकता को धर्म का सार बताया और स्पष्ट किया कि जो विचार हमें शारीरिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से कमजोर बनाते हैं, उन्हें जहर समझकर त्याग देना चाहिए।
स्वामी विवेकानंद ने युवाओं के लिए जो आदर्श स्थापित किए, उनमें सबसे महत्वपूर्ण था चरित्र निर्माण और आत्मविश्वास। वे अक्सर कहते थे कि जो व्यक्ति स्वयं पर विश्वास नहीं करता, वह ईश्वर पर भी विश्वास नहीं कर सकता। उन्होंने युवाओं को केवल किताबी ज्ञान का बोझ ढोने के बजाय एक ऐसा मनुष्य बनने की प्रेरणा दी जिसके पास लोहे की मांसपेशियां और फौलाद की नसें हों। विवेकानंद का मानना था कि भारत का पुनरुत्थान तभी संभव है जब युवा वर्ग अपनी सुख-सुविधाओं का त्याग कर दरिद्र नारायण यानी समाज के वंचित और पीड़ित वर्ग की सेवा में लग जाए। उनके अनुसार, शिक्षा वही है जो मनुष्य को अपने पैरों पर खड़ा करे और उसमें समाज के प्रति उत्तरदायित्व का भाव जगाए। उन्होंने युवाओं को लक्ष्य के प्रति एकाग्र होने का वह महान मंत्र दिया, जिसमें एक विचार को अपना जीवन बनाने और उसी को जीने की बात कही गई है। उनके शब्द उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए आज 2026 के आधुनिक भारत में भी उतने ही जीवंत हैं, जितने एक शताब्दी पूर्व थे।
विवेकानंद का अध्यात्म पलायनवाद का मार्ग नहीं, बल्कि पुरुषार्थ का संदेश था। उन्होंने शरीर को आत्मा का मंदिर माना और शारीरिक सुदृढ़ता के लिए योग व व्यायाम को अनिवार्य बताया। उनका सुप्रसिद्ध आह्वान था कि गीता पढ़ने के बजाय फुटबॉल खेलकर आप स्वर्ग के अधिक निकट होंगे, जिसका अर्थ था कि जब तक शरीर बलिष्ठ और इंद्रियां वश में नहीं होंगी, तब तक गहन आध्यात्मिक सत्य को समझना असंभव है। उन्होंने राजयोग के माध्यम से मन के निग्रह और प्राणायाम व व्यायाम द्वारा प्राणशक्ति को संचित करने पर बल दिया, ताकि युवा कठिन पुरुषार्थ कर सकें। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक देश के करोड़ों लोग भूख और अज्ञानता के अंधकार में डूबे हैं, तब तक हर वह शिक्षित व्यक्ति जो उनके उत्थान का प्रयास नहीं करता, वह देशद्रोही है। उन्होंने युवाओं के भीतर उस अमृत तत्व को जगाने का प्रयास किया जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी मुस्कुराते हुए राष्ट्र सेवा का संकल्प ले सके। स्वामी जी का मानना था कि आने वाले समय में भारत का गौरव उसके हथियारों से नहीं, बल्कि उसके युवाओं के नैतिक साहस और आध्यात्मिक ज्ञान से तय होगा।
आज के इस डिजिटल और प्रतिस्पर्धात्मक युग में, जहाँ युवा अक्सर एकाकीपन और मानसिक अवसाद का शिकार हो रहे हैं, विवेकानंद के विचार एक प्रकाश स्तंभ की तरह कार्य करते हैं। वे हमें सिखाते हैं कि बाहरी दुनिया को जीतने से पहले अपनी आंतरिक शक्तियों पर विजय प्राप्त करना आवश्यक है। उनका दर्शन समाजवाद और आध्यात्मिकता का एक अनूठा संगम है, जो युवाओं को वैश्विक नागरिक बनने के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से गहराई तक जुड़े रहने की प्रेरणा देता है।
स्वामी जी ने धर्म को कर्मकांडों की संकीर्णता से मुक्त कर उसे मानवतावाद की ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनके लिए देशभक्ति केवल एक भावना नहीं, बल्कि जन-जन के प्रति गहरी संवेदना और उनके उत्थान का ठोस कार्य थी। वे चाहते थे कि भारत का युवा वर्ग विज्ञान की आधुनिकता और वेदांत की गहराई का सुंदर मेल बने। आज 2026 में, जब दुनिया तकनीकी क्रांतियों के दौर से गुजर रही है, तब विवेकानंद की शिक्षाएं हमें याद दिलाती हैं कि बिना नैतिकता और आध्यात्मिकता के तकनीक विनाशकारी हो सकती है। वास्तव में, स्वामी विवेकानंद के आदर्शों को अपनाना किसी पुरानी परंपरा को दोहराना नहीं है, बल्कि एक आधुनिक और सशक्त भारत की नींव को मजबूत करना है। विवेकानंद की जयंती पर उनके विचारों का मनन करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है और विकसित भारत एवं मानवता के संकल्प की सिद्धि का एकमात्र मार्ग भी है।
(लेखक पत्रकार हैं)
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