चुनावी पाबंदियां अनलॉक
चुनावी पाबंदियां अनलॉक

देश में कोरोना मरीजों की संख्या में गिरावट के बीच चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों को फिजिकल रैली करने की परमिशन दे दी है। रैली के लिए ग्राउंड और हॉल का प्रयोग किया जा सकता है। वहीं रैली में आए नेता और कार्यकर्ताओं के लिए कोरोना गाइडलाइन का पालन करना अनिवार्य होगा। आयोग ने पत्र जारी करते हुए कहा कि रैली के दौरान मैदान में उसकी कुल क्षमता की 30 फीसदी भीड़ ही जुटाई जा सकती है। वहीं इंडोर हॉल में 50 फीसदी उपस्थिति के साथ सभा करने की अनुमति है। पदयात्रा, बाइक रैली और जुलूस निकालने पर पहले की तरह प्रतिबंध जारी रहेगा। कोरोना मरीजों की संख्या में गिरावट के बीच छोटी पार्टियां लगातार रैली करने की अनुमति मांग रही थी। इन पार्टियों का तर्क था कि संसाधन नहीं होने की वजह से वर्चुअल रैली करने में कठिनाई हो रही है और इस वजह से हम जनता तक अपनी बात नहीं पहुंचा पा रहे। वैसे आयोग ने प्रतिबंधों की अवधि 11 फरवरी तक और बढ़ा दी थीं, मगर यह मियाद खत्म होने से पहले उसने नए आदेश जारी कर दिए। नया आदेश पहले चरण के प्रचार खत्म होने से दो दिन पहले आया है। लिहाजा दूसरे चरण के मतदान वाले राज्यों या सीटों पर प्रत्याशियों को राहत मिलेगी। हालांकि पहले से चले आ रहे प्रतिबंधों के बावजूद जिस तरह से राजनीतिक दलों ने निर्वाचन आयोग की नजरों में धूल झोंकने का भरपूर प्रयास किया, वे ताजा फैसले के बाद नहीं करेंगे, इसका दावा करना मुश्किल है। यों भी राजनेताओं को भीड़ देख कर ही उत्साह बनता है, इसलिए जिस समय दस लोगों को साथ लेकर घर-घर जाकर प्रचार करने की इजाजत थी, उस समय भी सैकड़ों लोगों को साथ लेकर चल रहे थे। उसमें मुंह ढंकने और उचित दूरी का पालन करने की जरूरत शायद कोई नहीं समझ रहा था। दरअसल, निर्वाचन आयोग की यह शर्त कई नेताओं के साथ व्यावहारिक रूप में लागू करना संभव नहीं हो पा रहा था। राजनीतिक दलों के बड़े चेहरों के सुरक्षा इंतजाम में ही इतने लोग लगे रहते हैं कि उन्हें दस की संख्या तक सीमित रख पाना संभव नहीं होता। इसलिए मांग की जा रही थी कि प्रशासन को कुछ ऐसा इंतजाम करें, जिससे भीड़भाड़ को काबू में रखना आसान हो सके। शायद इसे भी ध्यान में रखते हुए निर्वाचन आयोग ने कुछ ढिलाई दी है। यों कोरोना के मामले अब पहले से कम दर्ज हो रहे हैं, पर चिंता की बात है कि इससे होने वाली मौतों का आंकड़ा निरंतर बढ़ रहा है, इसलिए इसे लेकर किसी भी प्रकार की लापरवाही खतरे से खाली नहीं मानी जा सकती। ऐसे में जिस तरह राजनीतिक दल प्रचार में नियम-कायदों को ताक पर रखते देखे जा रहे हैं, वे नए नियमों के बाद कुछ और छूट लेने का प्रयास करेंगे। मतदान की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आती है, राजनीतिक दलों में प्रचार की होड़ बढ़ जाती है। इसलिए वे निर्वाचन आयोग के दिशा-निर्देशों की धज्जियां उड़ाने से शायद ही बाज आएं। मगर निर्वाचन आयोग से अपेक्षा है कि जब उसने नियम बनाए हैं, तो उन पर अमल भी कड़ाई से सुनिश्चित कराए। वरना उसकी ढिलाई पर पहले ही अंगुलियां उठती रही हैं। इस बार मामला बड़ी आबादी की सेहत का है, इसलिए इसमें किसी प्रकार की ढिलाई नहीं बरती जानी चाहिए।
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देश में कोरोना मरीजों की संख्या में गिरावट के बीच चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों को फिजिकल रैली करने की परमिशन दे दी है। रैली के लिए ग्राउंड और हॉल का प्रयोग किया जा सकता है। वहीं रैली में आए नेता और कार्यकर्ताओं के लिए कोरोना गाइडलाइन का पालन करना अनिवार्य होगा। आयोग ने पत्र जारी करते हुए कहा कि रैली के दौरान मैदान में उसकी कुल क्षमता की 30 फीसदी भीड़ ही जुटाई जा सकती है। वहीं इंडोर हॉल में 50 फीसदी उपस्थिति के साथ सभा करने की अनुमति है। पदयात्रा, बाइक रैली और जुलूस निकालने पर पहले की तरह प्रतिबंध जारी रहेगा। कोरोना मरीजों की संख्या में गिरावट के बीच छोटी पार्टियां लगातार रैली करने की अनुमति मांग रही थी। इन पार्टियों का तर्क था कि संसाधन नहीं होने की वजह से वर्चुअल रैली करने में कठिनाई हो रही है और इस वजह से हम जनता तक अपनी बात नहीं पहुंचा पा रहे। वैसे आयोग ने प्रतिबंधों की अवधि 11 फरवरी तक और बढ़ा दी थीं, मगर यह मियाद खत्म होने से पहले उसने नए आदेश जारी कर दिए। नया आदेश पहले चरण के प्रचार खत्म होने से दो दिन पहले आया है। लिहाजा दूसरे चरण के मतदान वाले राज्यों या सीटों पर प्रत्याशियों को राहत मिलेगी। हालांकि पहले से चले आ रहे प्रतिबंधों के बावजूद जिस तरह से राजनीतिक दलों ने निर्वाचन आयोग की नजरों में धूल झोंकने का भरपूर प्रयास किया, वे ताजा फैसले के बाद नहीं करेंगे, इसका दावा करना मुश्किल है। यों भी राजनेताओं को भीड़ देख कर ही उत्साह बनता है, इसलिए जिस समय दस लोगों को साथ लेकर घर-घर जाकर प्रचार करने की इजाजत थी, उस समय भी सैकड़ों लोगों को साथ लेकर चल रहे थे। उसमें मुंह ढंकने और उचित दूरी का पालन करने की जरूरत शायद कोई नहीं समझ रहा था। दरअसल, निर्वाचन आयोग की यह शर्त कई नेताओं के साथ व्यावहारिक रूप में लागू करना संभव नहीं हो पा रहा था। राजनीतिक दलों के बड़े चेहरों के सुरक्षा इंतजाम में ही इतने लोग लगे रहते हैं कि उन्हें दस की संख्या तक सीमित रख पाना संभव नहीं होता। इसलिए मांग की जा रही थी कि प्रशासन को कुछ ऐसा इंतजाम करें, जिससे भीड़भाड़ को काबू में रखना आसान हो सके। शायद इसे भी ध्यान में रखते हुए निर्वाचन आयोग ने कुछ ढिलाई दी है। यों कोरोना के मामले अब पहले से कम दर्ज हो रहे हैं, पर चिंता की बात है कि इससे होने वाली मौतों का आंकड़ा निरंतर बढ़ रहा है, इसलिए इसे लेकर किसी भी प्रकार की लापरवाही खतरे से खाली नहीं मानी जा सकती। ऐसे में जिस तरह राजनीतिक दल प्रचार में नियम-कायदों को ताक पर रखते देखे जा रहे हैं, वे नए नियमों के बाद कुछ और छूट लेने का प्रयास करेंगे। मतदान की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आती है, राजनीतिक दलों में प्रचार की होड़ बढ़ जाती है। इसलिए वे निर्वाचन आयोग के दिशा-निर्देशों की धज्जियां उड़ाने से शायद ही बाज आएं। मगर निर्वाचन आयोग से अपेक्षा है कि जब उसने नियम बनाए हैं, तो उन पर अमल भी कड़ाई से सुनिश्चित कराए। वरना उसकी ढिलाई पर पहले ही अंगुलियां उठती रही हैं। इस बार मामला बड़ी आबादी की सेहत का है, इसलिए इसमें किसी प्रकार की ढिलाई नहीं बरती जानी चाहिए।
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