चाबहार पर सियासत: कांग्रेस बोली- शासन में निरंतरता की सच्चाई स्वीकार नहीं करती सरकार
चाबहार पर सियासत: कांग्रेस बोली- शासन में निरंतरता की सच्चाई स्वीकार नहीं करती सरकार
मिडिल ईस्ट में संघर्ष के बीच कांग्रेस महासचिव (संचार प्रभारी) जयराम रमेश ने ईरान के चाबहार बंदरगाह पर भारत सरकार की रणनीति को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि चाबहार अब परिदृश्य में दिखाई नहीं दे रहा है। यह भारत की मध्य एशिया कूटनीति के लिए दूसरा रणनीतिक झटका है।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, “शासन में निरंतरता एक बुनियादी सच्चाई है, जिसे वर्तमान सरकार कभी स्वीकार नहीं करती।”
उन्होंने आगे लिखा, “1990 के दशक के उत्तरार्ध से ही भारत ने भारत-अफगानिस्तान-ईरान सहयोग रणनीति के तहत ईरान के चाबहार बंदरगाह में निवेश की संभावनाओं की तलाश शुरू कर दी थी। अंततः तेहरान में आयोजित 16वें गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन में भाग लेने के बाद मनमोहन सिंह ने इन योजनाओं को नई गति दी और मई 2013 में केंद्रीय कैबिनेट ने चाबहार में प्रारंभिक तौर पर 115 मिलियन डॉलर के निवेश को मंजूरी दी। यह याद रखना चाहिए कि यह फैसला उस समय लिया गया था, जब भारत अक्टूबर 2008 में हस्ताक्षरित भारत-अमेरिका परमाणु समझौते को लागू करने के लिए बड़े कदम उठा रहा था।”
जयराम रमेश ने लिखा, “अक्टूबर 2014 में भाजपा सरकार ने, जैसा कि वह अक्सर करती रही है, मनमोहन सिंह की चाबहार पहल को रीपैकेज किया और उसे प्रधानमंत्री के विजन का हिस्सा बताकर पेश किया। 2026-27 के बजट में चाबहार के लिए कोई आवंटन नहीं किया गया। क्या इसका मतलब यह है कि भारत इस परियोजना से बाहर हो गया है या फिलहाल उसके निवेश संबंधी दायित्व पूरे हो चुके हैं?”
पूर्व केंद्रीय मंत्री ने पोस्ट में लिखा, “किसी भी स्थिति में, पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह जिसे चीन ने बनाया है, से लगभग 170 किलोमीटर पश्चिम स्थित चाबहार अब परिदृश्य में दिखाई नहीं दे रहा है। यह भारत की मध्य एशिया कूटनीति के लिए दूसरा रणनीतिक झटका है, क्योंकि इससे पहले भारत ताजिकिस्तान के दुशांबे के पास अयनी में स्थित अपने वायुसेना अड्डे को बंद कर चुका है।”