धड़ाम की सीख

धड़ाम की सीख

-डॉ० सत्यवान सौरभ-

हद से ऊपर जो उड़ने लगा,
उसे ज़मीन की याद कहाँ रहती है।
चमक जब आँखों पर चढ़ जाए,
तो सच की रोशनी धुंधली पड़ जाती है।

चांदी ने भी यही कहानी दोहराई,
ऊँचाई पर खुद को अमर समझ बैठी।
1.28 लाख की चोटी पर चढ़कर,
गिरने की आहट अनसुनी कर बैठी।

बाज़ार का भी अपना धर्म है,
यह न किसी का सगा होता है।
जो सीमा लाँघे, जो होश खोए,
वही सबसे पहले ठगा होता है।

उछाल में अकड़ जन्म लेती है,
और अकड़ में विवेक मर जाता है।
धड़ाम की आवाज़ तब आती है,
जब गुरूर अपने शिखर पर होता है।

चमक सिखाती है सबक यह—
हर ऊँचाई टिकने के क़ाबिल नहीं होती।

दीदार ए हिन्द की रीपोर्ट

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