अशांत मन का उपाय…

अशांत मन का उपाय…

अशांत मन मनुष्य की मुख्य समस्या है। अशांत चित्त आधुनिक मनोविज्ञान की भी समस्या है। योगविज्ञान की खोज का कारण भी यही समस्या थी। अशांत मन भागता है। वह बुध्दि से नहीं जुड़ता। जुड़ता भी है तो बुध्दि को भी लपेटे में लेता है। बुध्दि अस्थिर हो जाती है। प्रकृति की प्रतिकूलता बढ़ती है, इसी से दुःख का जन्म होता है। संसार में दुःख हैं, दुःखों के कारण हैं और दुःख दूर करने के उपाय भी हैं। प्राचीन भारतीय दर्शन की यही प्रमुख समस्याएं थीं। जीवन में कर्मश्रम का महत्व है, लेकिन हरेक कर्म बांधता है।

बंधन अशांत करते हैं और दुःख आते हैं। उपनिषद् दर्शन और गीता में कर्मबंधन से मुक्ति के उपाय हैं। श्रीकृष्ण ने अर्जुन के बताया आसक्ति को त्यागकर अपने सभी कर्म ब्रह्म को समर्पित करने वाले व्यक्ति को पाप (कर्मबंधन-उसी प्रकार नहीं स्पर्श करते जैसे कमल के पत्ते को पानी नहीं छू पाता। (गीता 5.10-यहां ब्रह्म विराट सम्पूर्णता है। हमारी सक्रियता सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से स्वतंत्र नहीं है। हमारे कर्म भी उसी सम्पूर्णता की सक्रियता का भाग हैं। लेकिन हम स्वयं को कत्र्ता मानते है। इसीलिए यहां सभी कर्मों को ब्रह्मण्याधाय- ब्रह्म अर्पित करने का संदेश है। संन्यास का अर्थ कर्मत्याग नहीं है। कर्मफल से आसक्ति के त्याग के साथ निजी कर्म को ब्रह्म कर्म जाना ही गीता का संन्यास है।

कर्म आसक्ति निरर्थक:- शरीर उपकरण है। यही मन, बुध्दि और इन्द्रियों के माध्यम से कर्म करता है। सचेत जागृत व्यक्ति इस बात को जानता है कि वह स्वयं कोई कर्म नहीं करता। इसलिए कर्म आसक्ति बेमतलब है। कृष्ण कहते हैं योगीजन आसक्ति त्यागकर केवल शरीर, मन, बुध्दि या इन्द्रियों द्वारा कार्य करते हैं। (वही 11-शरीर प्रकृति से बना है। प्रकृति के गुण ही कर्म सक्रिय रहते हैं। मन बुध्दि और इन्द्रियां उपकरण बनती हैं। योग सिध्द व्यक्ति यह तत्व जानते हैं। कृष्ण जोड़ते हैं, ऐसे लोग कर्म फलों की आसक्ति को त्यागकर अविचल शांति पाते हैं।

लेकिन इससे अलग लोग कर्म के फल में आसक्त रहकर फल इच्छा से प्रेरित रहते हैं और कर्म बंधन में फंसते हैं। (वही 12-कर्म बांधते हैं। यह बात पक्की है। बंधन दुःखदायी है, इसी से बेचैनी है। ऐसे में चित्त का अशांत रहना स्वाभाविक है। कृष्ण बताते हैं सभी कर्मों को मन से त्याग कर स्वयं को वश में करने वालान कोई कर्म करता है और न कोई कर्म करवाता है। वह बिना कुछ किए ही नौ द्वारों वाले नगर में सुखपूर्वक रहता है। (वही 13-यहां मन का संन्यास है- मनसा संन्यास्ते। मन से कर्म त्यागने का संदेश है। हम सब के जीवन में ऐसा अक्सर घटित होता है। हम भीड़ में खड़े हैं। आंखें देख रही हैं, लेकिन मन नहीं देखता। इस बीच कोई परिचित, सुन्दर या असुन्दर ध्यान आकर्षित करता है, हम देखने की कार्रवाई में मन जोड़ते हैं, लेकिन पहले देखते हुए भी नहीं देख रहे थे। तटस्थ थे।

गीता का संदेश देखते हुए भी न देखना है। कर्म करते हुए भी मन से तटस्थ रहना है। नौ द्वारों वाले नगर का उल्लेख वैदिक परम्परा है। श्वेताश्वतर उपनिषद् (3.18)का मंत्र भी यही कहता है नवद्वारे पुरे देही हंसो लेलायते बहिः- वह हंस (परम तत्व-नौ द्वारों वाले नगर में लीला कर रहा है। लेकिन कठोपनिषद् (2.2.1-में ग्यारह द्वारों वाला नगर है- पुरम् एकादश द्वारम् अजस्या अवक्रचेतसः दृ वह विशुध्द अजन्मा परमतत्व 11 द्वारों वाले नगर में रहता है। गीता और श्वेताश्वतर में वर्णित 9 द्वार है- दो आंख, दो कान, नाक के दो छिद्र, मुख, उपस्थ और गुदा।

इसके पहले इसी सूची में ब्रह्मरंध्र और जननेन्द्रियां लाकर 11 द्वार बताये गये थे। यहां शरीर को एक सुन्दर पुर-नगर बताया गया है। इसके भीतर रहने वाला इस नगर के चक्कर में फंसकर बंधन में पड़ता है, यही अनासक्त होकर मुक्त होता है। कृष्ण कहते हैं कि सर्वोच्च सत्ता किसी र्को कत्ता नहीं बनाती, वह स्वयं कर्म नहीं करती, वह कर्मों का फलों के साथ संयोग भी नहीं करती है। प्रवृत्ति का मूल कारण स्वभाव ही है। (वही 14-यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि सर्वोच्च सर्वव्यापी सत्ता कर्मों का फलों के साथ संयोग नहीं करती-न कर्मफलंसंयोगं। यह स्थापना बहुत महत्वपूर्ण है- कर्मों का फल सर्वोच्च सत्ता नहीं देती। कर्म से मिलने वाला परिणाम प्रकृत्ति की समूची शक्तियों की सक्रियता का नतीजा होती है।

पाप और पुण्य सामाजिक स्थापनाएं हैं। विज्ञान और दर्शन में पाप और पुण्य या गलत और सही का कोई स्थान नहीं होता। गीता भी यही कहती है। श्रीकृष्ण ने बताया सर्वव्यापी सत्ता किसी का पाप नहीं स्वीकार करती है और न ही पुण्य। अज्ञान द्वारा ज्ञान ढंका हुआ है। लोग इसीलिए मोह में फंसते हैं। (वही 15-पाप और पुण्य के तर्क सर्वव्यापी दृष्टिकोण में नगण्य है। असल बात है- आत्मबोध। कठिनाई है कि ज्ञान अज्ञान से ढंका हुआ है- अज्ञानेनावृत्तं ज्ञानं। यही बात गीता से बहुत पहले ईशावास्योपनिषद् (मंत्र 15-में ज्यादा खूबसूरत ढंग से कही गयी है, हरिण्यमयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखं-स्वर्ण पात्र से सत्य का मुख ढका हुआ है। यहां ज्ञान पर पड़ा अज्ञान का आवरण स्वर्णिम है। स्वर्ण यहां सांसारिक राग प्रीति का प्रतीक है। कृष्ण बताते हैं जिनका अज्ञान ज्ञान के आलोक में नष्ट हो जाता है उनका ज्ञान दिव्य सूर्य की ज्योति की तरह अन्तर आत्मा को प्रकाशित कर देता है। (गीता 5.16-अज्ञान के कारण ही दुःखहैं। ज्ञान की दीप्ति जरूर है। गीता इसी दीप्ति के लिए अनासक्त कर्म, योग और भक्ति के तमाम मार्ग बताती है।

परमसत्ता का साक्षात्कार:- व्यक्ति सम्पूर्णता का ही एक भाग होता है। प्रकृति के गुणों के कारण वह स्वयं को अलग इकाई मानता है। ज्ञान सर्वव्यापी परमसत्ता का साक्षात्कार कराता है। इसके लिये योग सिध्दि, प्रगाढ़ भक्ति और अनासक्ति जैसे उपकरण सहायक होते हैं। कृष्ण कहते हैं उसी को बुध्दि का विषय बनाते हुए, अपनी सम्पूर्ण चेतना को उसी में लगाये हुए, उसे ही अपने जीवनका सर्वोच्च लक्ष्य बनने से उनके सम्पूर्ण पाप (कर्मबंधन-धुल जाते हैं। वे उसी की साधना से जहां पहुंच जाते हैं, वरां सेफिर वापिस नहीं लौटना होता- गच्छन्त्य पुनराथृत्ति। (वही 17-भारतीय चिन्तन परम्परा पुनर्जन्म मानती है। ज्ञान मुक्ति का द्वार है। ज्ञान प्राप्त योगी मुक्त हो जाता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता।

आत्मबोध वस्तुतः आत्म साक्षात्कार की ही उच्चतम दशा है। अध्यात्म, आत्म साक्षात्कार और आत्मबोध आदि सभी तत्व संकेतों का लक्ष्य स्वयं का परिचय है। स्वयं को पूरा जानने के लाद ही पूरा सुख है। फिर परमसत्ता के द्वार खुल जाते हैं। श्रीकृष्ण बताते हैं भक्ति के द्वारा वह मुझे (परम-तत्वतः जान लेता है कि मैं कौन हूं? और कितना हूं? यह सब जान लेने के बाद वह मुझमें (परम-ब्रह्म-प्रवेश कर जाता है। फिर सारे कर्म करता हुआ मेरे आश्रय में होकर वह शांत और अविनाशी पद- पदमव्ययमं्, कभी न नष्ट होने वाला उच्चतर तल पाता है। (वही 18.55-56)

गीता में श्रीकृष्ण ने अनेक वक्तव्यों में स्वयं को परमसत्ता, भगवान और परमपद कहा है। आधुनिक विज्ञानविदों को उनके ऐसे वक्तव्य सही नहीं प्रतीत होते। सृष्टि के सभी प्राणियों में एक ही उच्चतम् प्रवाह है। वह एक परम सत्ता ही सब ओर आच्छादित, प्रवाहित और सक्रिय जानी गयी है। चेतना के तमाम तल होते हैं। इसलिए एक ही व्यक्ति स्वयं को भिन्न-भिन्न परिचय देता है।

व्यक्ति स्वयं को दुःखी बताता है, सुखी बताता है, आनंदित बताता है। भक्त या ज्ञानी बताता है, तुलसीदास ने विनय पत्रिका में स्वयं को अधम और कुटिल वगैरह बताया है। मनुष्य अपनी चेतना के ही भिन्न-भिन्न तलों से भिन्न-भिन्न परिचय देता है। ऋग्वेद के ऋषि वामदेव ने कहा था-अहं मनुर्भव-में ही पहले मनु हुआ था, मैं ही उशना कवि था। आदि। श्रीकृष्ण चेतना के परमतल पर बोलते हुए अर्जुन से कहते हैं सब कर्मों को मुझे समर्पित करो, बुध्दि को समग्र बनाकर अपनी सम्पूर्ण चेतना को मुझमें लगाओ। तुम अपने चित्तको मुझमें लगाकर मेरे प्रसाद से सारी कठिनाइयां पार करोगे।

लेकिन अहंकार के कारण यह तत्व न सुनने से तू बिखर जायेगा। (वही 57-58-यहां अहंकार स्वयं को विराट सम्पूर्णता से अलर्ग कत्ता जानना है। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं अगर अहंकार के कारण तू निश्चित करता है कि मैं नहीं लड़ूंगा तो यह सोचना बेकार है। प्रकृति तुझे विवश करेगी। मोहवश जिस काम को तू नहीं करना चाहता, उसे भी तू इच्छा न होते हुए भी स्वभाव से उत्पन्न कर्म में बंधा हुआ करेगा। (वही 60-मनुष्य के पास कर्म स्वातंत्र्य नहीं है, वह प्रकृति के कारण स्वभाव के अनुसार कर्म करने को विवश है। योग और ज्ञान से प्राप्त प्रबुध्द चेतना ही कर्म स्वातंत्र्य पाती है।

दीदार ए हिन्द की रीपोर्ट

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