वह डर…

वह डर…

-कुसुम भट्ट –

वह एक बर्फीली शाम थी। उन दिनों शाम को हल्की-हल्की बर्फ पड़नी शुरू हो गयी थी। ऊंची पहाड़ियां चांदी से ढकी थीं। मौसम में धुंध छायी हुई थी। मैं छज्जे पर बैठी दाना चुगती चिड़ियों को देख रही थी। थोड़ी देर हुई थी मुझे स्कूल से आये हुए। तभी बगल में गठरी दबाए अधेड़ उम्र की एक औरत आयी। उसके गले में ढोल लटक रहा था। उसने ढोल के रस्सों पर खुसी लकड़ियां निकालीं और ऊंची आवाज में बोली- समनेन ठाकुरो! राजी रहें दिशा ठाकुर…। वह उत्साहित होकर ढोल बजाने लगी-डम डम डम। अब निकल भी आओ ठाकुरो… कुछ दे भी दो बचा-खुचा…।
ढोल की आवाज सुनकर धुएं से भरी आंखें पोंछती मां बाहर आई-अरे सैनू की बहू। मां के चेहरे पर मुस्कान की रेखा खिंच गयी।
समनेन ठाकुरो। उसने सलाम की मुद्रा में मां को आदाब किया। उसकी आंखें मुझ पर ठहर गयीं- यह गुड्डीं दिशा है? जब हम आये थे, इती सी थी।
हां-इतने वर्षों में आ रहे हो तुम हमारे गांव। मां आगे बढ़ी और छज्जे में खड़ी हो गयी।
औरत ने सिर झुकाया- हां ठाकुरो… पांच वर्षों से आ नहीं पाये हम। अब तो खूब फटे कपड़े इकट्ठेस कर लिए होंगे… बहुत बढ़िया गदेला बनाऊंगी ठाकुरो! उसकी आंखें मुझ पर चिपक गयीं पुनः समनेन दिशा!
मैं खिल-खिल हंसने लगी- इतनी बड़ी तो हो…फिर भी नमस्ते तो मुझे ही करनी है तुम्हें। मैंने दोनों हाथ जोड़े-नमस्ते की…ऊं…हां… मैं क्या बोलूंगी तुम्हें?
मां का चेहरा खिंचने लगा… फिर एकाएक कोई उजला रंग जाने कहां से मां के चेहरे पर टपक पड़ा- तू इसे बौजी बोलेगी।
आं… हां मैं तुम्हारी बौजी, तुम मेरी ननद। उसकी बड़ी-बड़ी खूबसूरत आंखें वात्सल्य के रंगों से झिलमिला उठीं। उस स्नेह के वशीभूत मैं सीढ़ियां उतर कर झटपट उसके पास पत्थर की दीवार पर बैठ गयी जो घर के चारों तरफ फैली हुई थी। एकाएक मां ने डपट दिया- अरी। पहले खाना तो खा लें।
मैं सीढ़ियों पर चिड़िया-सी फुदकती बोड पर चढ़ गयी। तभी पीछे से आती आवाज ने ठिठकने पर मजबूर कर दिया- दिशा! मेरे लिए भी रखना भात… बहुत भूख लगी है…।
मां ने थाली में भात परोसा। थोड़ा भात पतीले में रह गया। मैंने अपनी थाली का थोड़ा भात निकालकर एक प्लेट में रखा- मां, बौजी को भी दे दे थोड़ा भात… बहुत भूखी है बेचारी।
चुप्प। मां ने घुड़की दी और प्लेट का भात पतीले में डालकर पीछे के चुल्हे में रख दिया। भात कौन देता है उन्हें… उसके लिए चाय बनाती हूं।
झटपट केतली में पानी डाला और चूल्हे में रखकर मां आंच सुलगाने लगी-तू खा ले…खाती क्यों नहीं? मां फूंक मारने लगी। मैंने एक कौर दाल में साना। उसकी आंखें कह उठीं-भूख…। मैंने हाथ का कौर तौले (जानवरों को पानी पिलाने का तांबे का बड़ा भगोना) में डाल दिया- मां! मेरा खाना बौजी को दे दे… मुझे बिल्कुल भूख नहीं है।
मां भेली से गुड़ की डली तोड़ रही थी। चाकू की नोक कांसे की थाली में लगती। सूखे गुड़ की भेली से थाली टन्न बजती। थोड़ा-सा चूरा गिरकर छितरा पड़ता। कुछ थाली में और कुछ मिट्टीी के फर्श पर। थोड़ी मशक्कत करने पर भी मां से गुड़ नहीं टूटा तो उसने चूरे की गोली बनायी। पीतल के गिलास (पुराने और नोक टूटे) में चाय डाली-चुपचाप खा ले खाना… मैं सैनू की बहू को चाय देकर आती हूं।
मैं भी मां के पीछे-पीछे सीढ़ियां उतरी। मां ने सैनू की औरत से कुछ दूरी पर गुड़ की गोली और गिलास रख दिया-ले पी ले… दूध की चाय बनायी है।
मां पीछे मुड़ी- अरी! तू क्यों बछड़ी-सी मेरे पीछे आ जाती है? जरा खाना खा ले… देख! नीचे मत आना… अपनी चाय में थोड़ा और दूध डाल देना…। मां मेरे कान में फुसफुसाई और गागर उठाकर धारे के रास्ते पर चल दी।
मैंने चाय में चीनी और दूध डाला। एक गिलास में औटाकर सैनू की औरत के हाथ में थमाई। मां ने तुम्हें फीकी चाय दी थी?
उसने अपना गिलास आगे बढ़ाया इसमें डाल दो दिशा। इस बार उसके गिलास में चाय अपने असली रंग में आ गयी। उसी अनुपात में उसके सांवले चेहरे पर भक्क उजास फैल गया। वह अपनी मैली धोती के पल्लू से गिलास थामकर सुड़क-सुड़क कर पीने लगी। उसकी चाय समाप्त हो गयी तो उसने आंखें मेरे चेहरे पर टिका दीं। होंठ मौन थे। पर आंखों से आशीष के पुष्प झरने लगे…।
मैं ऊपर गयी और अपनी चाय लेकर उसके पास आ गयी। उसकी नजर नीचे की सगवाड़ी पर केंद्रित हो गयी जहां मूली, राई तथा प्याज के पत्तों की हरियाली फैली थी। मैं भी उसी तरह उसके पास बैठकर चाय का घूंट भरने लगी। वह पीछे मुड़ी तो उसने देखा… और हड़बड़ा कर दूर सरकने लगी- दिशा…दिशा…ये क्या करती हो। तुम्हें पता नहीं… कि हमारा छुआ… तुम अभी बच्ची हो…जाओ दिशा…ऊपर जाओ… हमें तो भगवान को भी जवाब देना है…जाओ… हटो…।
वह मुझसे दूर-दूर और दूर होने लगी। उसके चेहरे पर भय की परछाईं देखकर मुझे मजा आने लगा…। एक-एक घूंट भरती हुई मैं सरक-सरक कर उसका कंधा छूने लगी और खिलखिलाने लगी मैं… तो तुम्हारे साथ… तुम्हें छूकर ही चाय पीऊंगी… लो… पी भी ली…। हि हि हि…।
गुड्डी।! मां ने पूरी ताकत से पुकारा।
मां की चीख से हड़बड़ा कर उठी तो चाय छलक कर मेरे कपड़ों पर गिर गयी। मां खा जाने वाली नजरों से मुझे घूर रही थी। गागर से पानी की बूंदें टपक-टपक कर मां को भिगो रही थीं- मैं जरा- सी देर हौज का पानी खोलने क्या गयी कि किसी ने मेरी गागर ही फोड़ दी। कीड़े पड़ें उसके…। मां ने बड़बड़ाते हुए गागर सीढ़ी पर रखी और मुझसे मुखातिब हुई- चल नीचे उतर…अक्ल की दुश्मन।
मैं दीवार से कूदी। मां की इकलौती संतान होने के कारण मैं थोड़ी शैतान भी थी, पर मां मुझसे बहुत अधिक लाड़ करती थी। शायद ही कभी मां ने मुझे डांटा हो। इसलिए मां से मुझे ऐसी कोई उम्मीद नहीं थी, पर मां ने आंगन में पड़ी भीमल की डंडी उठाई और तड़ातड़ मेरी पीठ पर जमा दी। मैंने बहुत मोटा स्वेटर पहन रखा था। पीड़ा तो ज्यादा नहीं हुई, किन्तु अपमान के कारण मैं रोने लगी।
मां चीखकर बोली-तुझे बोला था न, भीतर ही पीना चाय।
मैं, दुगने वेग से चीखने लगी-पीऊंगी जरूर पीऊंगी। मैं बौजी के साथ खाना भी खाऊंगी…। इस पर कुछ लगा है क्या?
ऊं…ऊं… आंखें मलते हुए मैं रोती जा रही थी। लेकिन मां पर तो काली सवार थी- ऐसा जवाब! एक पती की छोरी… मां को ही आंख दिखा रही है। मां ने मेरी दाहिनी तरफ की चुटिया, जिसमें सुबह मां ने मोड़कर लाल रिबन का फूल लगाया था, खींच डाली।
सैनू की औरत बीच में आकर छुड़ाने को हुई-मारो मत ठाकुरो… बच्ची है… इसे क्या पता…कि हमें छूकर चाय नहीं पीनी चाहिए…।
अछूत! मरे कानों पर पर्दे फाड़ने लगा यह शब्द। आज ही तो पढ़ाया था अमर सिंह गुरुजी ने कि कोई अछूत नहीं है। किसी से घृणा नहीं करनी चाहिए। मैं चिल्लाकर मां को समझाना चाहती थी पर मेरी छाती में कसैला धुआं भरा था। मुझसे कोशिश करने पर भी बोला नहीं गया। जब खूब रो ली तो सिसकी भर कर कहा- हमारे मास्टर जी ने बोला था…।
मां की आंख खिंचने लगीं-कौन मास्टर है वह…?
अमर सिंह गुरुजी। सिसकते हुए मैंने कहा।
अच्छा! वह खसिया- मास्टर होकर उल्टी पट्टीै पढ़ा रहा था बच्चों को। कल ही मिलतीं हूं उससे। ऐसी डांट लगाऊंगी कि भूल जायेगा पढ़ाना भी…।
मां ने मुझे परे धकेला और सैनू की औरत से मुखातिब हुई अरी-मेरी गुड्डीे तो अभी छोटी है। इसे इतनी अक्ल थोड़े ही है। पर तू तो… सयानी है। तूने रोका क्यों नहीं इसे…?
सैनू की औरत लज्जित होकर सिकुड़ने लगी- रोका था ठाकुरो… आपका नमक खाया है… आप तो हमारे अन्नदाता हो… हमारी जीभ पर कीड़े पड़ें। दिशा ठिठोली कर रही थी।
ओह! मां के होंठ विकृत हो गये। गांव भर में मैं ही तुम लोगों को मान देती हूं, मेरी ही ओबरी में वर्षों से ठहरते रहे तुम…। मेरी सास भी तुम्हें भरपूर पसारा देती थी… और तुम। जिस थाली में खाया उसी में छेद। आग उगलती मां मेरी बांह पकड़कर नहलाने के लिए ले जाने लगी। मुझे नहाने वाले पत्थर पर खड़ा करके मां चूल्हे में आग जलाने लगी (यह चुल्हा पशुओं को पानी गरम करने के लिए खलिहान में ही बनाया गया था)। जब मैं नहा चुकी तो स्वेटर पहनाते हुए मां मेरे कान में फुसफुसाने लगी- गुड्डी।, आले में गौंत (गोमूत्र) रखा है, उसे एक अंजुली पीकर बाकी कपड़ों में छिड़क देना…। मैं सगवारी में राई तोड़ने जा रही हूं। तभी मां को शायद कुछ याद आया…। दो कदम चलकर वापस लौटी और मुझे घुड़कते हुए बोली- अरी! उंगली डाल मुंह में…चल उल्टी कर। मैंने मां के डर से पांचों उंगलियां मुंह में डालने की कोशिश की। आक…थू-थू… मुझे उल्टी नहीं आती मां।
छि…छि… तेरी तो चंद्रैण करनी पड़ेगी अब… वह तो भैंस और गोरू भी खाती है…आक थू…। मां ने खंखार कर थूका। बलगम देखकर मुझे भक्क उल्टी आ गयी। दिन भर का खाया-पिया उगल डाला सब। मैंने मां के जाते ही गोमूत्र का डिब्बा उलट दिया। मुझे लगा, मेरी मां महामूर्ख है। अरे, इस कबरी गाय को तो मैंने गू खाते देखा था। जब भी चराने ले जाओ, गू के ढेर पर मुंह मारती मिलेगी कमबख्त…थू… इससे तो सैनू की औरत अच्छी है। बस्स… वह नहा धोकर सुंदर कपड़े पहन ले…तो…। उसके बाल लंबे हैं। और आंखें जैसे दुर्गा भगवती की।
एकाएक मेरी आंखों के आगे दृश्य बदलने लगा। सैनू की औरत के शरीर पर लाल साड़ी आ गयी। चमचम चमकती उसकी किनारियां। उसके हाथ में त्रिशूल। उसके बाल पीठ पर ललहाने लगे। मैं कंपकंपाती देह लिए मां के पास गयी। मां चूल्हा जला रही थी- आ जा… मेरी बेटी… ले अब आग सेंक ले…। मां ने मेरे लिए जगह बनायी।
मां! मां वह… अछूत नहीं है…सच्ची। उसमें मैंने दुर्गा भगवती को देखा। भगवान की कसम। सैनू की औरत दुर्गा भगवती में बदल गयी। मैं मां के घुटने पकड़ कर हिलाने लगी।
क्या बक रही है ? मां विस्फारित नेत्रों से मुझे देखने लगी।
हां मां… वह दुर्गा भगवती में बदल गयी। मां के चेहरे पर एक-एक करके कई रंग आये…। वह फुसफुसाई- कहीं उसने अपनी गड़देवी तो नहीं दिखा दी तुझे…?
पता नहीं… मां… पर मैंने उसमें दुर्गामाता देखी…।
मां का चेहरा निचुड़ गया हो जैसे…। वह अजीब तरह की आवाज निकालती सीढ़ियां उतरी। सैनू की औरत पत्थर की दीवार में गठरी बनी बैठी थी। मां उसके पांवों के पास खड़ी हो गयी। और उसके पांवों को पकड़ती हुई बोली- हे गड़देवी। मुझे क्षमा करना… मुझसे बड़ी भारी भूल हो गयी। मैंने सैनू की औरत को बुरा-भला कहा…इसके बदले मेरी गुड्डीझ को दंड मत देना…
सैनू की औरत पांव छुड़ाने की कोशिश करने लगी- क्या करते हो ठाकुरो… हमें पाप क्यों चढ़ाते हो… आपका नमक खाया है…आप हमारे अन्नदाता हो… अपना धर्म क्यों बिगाड़ते हो… हमारे पांव छोड़ दो… हमने कोई देवी-देवता दिशा को नहीं लगाया…।
अपनी गणेशी की कसम! दिशा पर दुर्गा भगवती की कृपा लगती है। तभी तो दिशा का मन पवित्र है…इसकी उम्र के बच्चे तो हमें छूते भी नहीं ठाकुरो। इस बच्ची ने एक दिन तुम्हारा नाम रोशन करना है…देख लेना…।
सच! सैनू की बहू! मां खुशी से उछल पड़ी। उसके चेहरे पर भक्क रोशनी भर गयी। मां ने झट मेरा हाथ खींचा-आ…जा… मेरी बच्ची। सैनू के बहू से आशीर्वाद ले… इस समय इसके घट में भगवती बैठी है। सैनू की औरत का हाथ खींचकर मेरे सिर पर रखती हुई मां प्रसन्न मुद्रा में खड़ी थी… और मेरे भीतर उस समय छोटे-छोटे विस्फोट होने की प्रक्रिया शुरू होने लगी- मां इस बेचारी से घृणा नहीं कर पाती… यदि वह अमर सिंह मास्टर जी की शिक्षा ग्रहण कर पाती। मास्टर जी रोज कहते हैं कि भगवान ने सिर्फ आदमी (मनुष्य) बनाया है। जात तो भगवान ने नहीं बनायी। पर यह सैनू की औरत! इसके कपड़े इतने मैले। इसके घर में साबुन क्यों नहीं…?
मां बंसुली से छिल्ला (चीड़ की विशेष प्रकार की लकड़ी) फाड़ने लगी। सैनू की औरत ठंड से कांप रही थी। मां ने अलाव जलाया ओबरी में। दोनों अब सगी बहनों की तरह आग सेंकते हुए बतियाने लगीं। सैनू की औरत मां से कहने लगी- आपका दिल भौत बड़ा है ठाकुरो…। गांव भर में ठौर भी यहीं मिलता रहा हमें हमेशा से… बाकी लोग तो एक-आध रोटी हमारे पल्लू में डालकर काम करवा लेते हैं। पेट भर खाना तो इसी घर में मिला हमें…सेठानी जी भी भली मानुष ठहरी, सुप्पा भर-भर झंगोरा (मोटा अनाज) उड़ेला करती थी इस पल्लू में। सैनू की औरत कमर पर खुसे पल्लू को खोलती हुई बोली।
पुलकित मां ने मुझे कोहनी मारी-तेरी बौजी के लिए हलवा बना दूं गुड्डीे? मैं क्या कहती। मेरा ध्यान तो अपनी हथेली पर बैठे जुगनू पर था। उसकी रोशनी से हथेली आलोकित हो रही थी।

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