ड्रोन दुर्घटनाओं में आपराधिक उत्तरदायित्व पर कर्नाटक उच्च न्यायालय ने मिसाल कायम की
ड्रोन दुर्घटनाओं में आपराधिक उत्तरदायित्व पर कर्नाटक उच्च न्यायालय ने मिसाल कायम की
बेंगलुरु, 11 अप्रैल कर्नाटक उच्च न्यायालय का फरवरी का एक निर्णय आज नई प्रासंगिकता पा रहा है, क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि आपराधिक कानून ड्रोन जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों से जुड़ी दुर्घटनाओं से कैसे निपटेगा — न केवल एक छिटपुट घटना में, बल्कि भविष्य में होने वाली कई अन्य घटनाओं में भी।
यह मामला बेंगलुरु ग्रामीण के एक शांत क्षेत्र में एक सामान्य ड्रोन परीक्षण के रूप में शुरू हुआ था, जहां एक हल्का प्रोटोटाइप ड्रोन अपना रास्ता भटक गया और पड़ोसी की संपत्ति में जा गिरा। इस घटना के कारण एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी, जिसे अंततः न्यायालय ने रद्द कर दिया। लेकिन तथ्यों से परे, यह निर्णय आगे बढ़ने के लिए इस बात को तय करने के कारण महत्वपूर्ण हो गया है कि जब कोई मानवीय मंशा या लापरवाही सिद्ध न हो, तो आपराधिक उत्तरदायित्व को यंत्रवत रूप से लागू नहीं किया जा सकता।
यह घटना 29 जनवरी को हुई थी जब ‘न्यूस्पेस रिसर्च एंड टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड’ डोड्डाबल्लापुरा में 48 एकड़ की पट्टे पर ली गई परीक्षण स्थल पर नियंत्रित ड्रोन परीक्षण कर रही थी। बैटरी की खराबी के कारण उड़ान के दौरान एक ड्रोन ने अपना संतुलन खो दिया और निर्धारित क्षेत्र से बाहर चला गया। कम दृश्यता और जी.पी.एस. में समस्याओं के कारण ड्रोन पास की संपत्ति में गिर गया और तुरंत उसका पता नहीं लगाया जा सका।
ड्रोन की मौजूदगी की शिकायत मिलने पर स्थानीय पुलिस ने स्वतः संज्ञान लेते हुए आपराधिक अतिचार और जीवन को संभावित खतरे का आरोप लगाते हुए प्राथमिकी दर्ज की, जिससे एक तकनीकी खराबी आपराधिक मामले में बदल गई।
कंपनी ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और कहा कि यह घटना आकस्मिक थी, इससे कोई नुकसान नहीं हुआ और इसमें आपराधिक मंशा का कोई तत्व नहीं था।
न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना ने छह फरवरी को जांच पर रोक लगा दी और 24 फरवरी के अंतिम आदेश में प्राथमिकी को रद्द कर दिया।
न्यायालय ने ऐसा करते हुए उस सिद्धांत पर जोर दिया जिसे अब स्वचालन के युग में महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि आपराधिक कानून ‘अपराध करने की मंशा’ पर आधारित होता है और इसे किसी “निर्जीव वस्तु” पर दोषारोपण करने के लिए विस्तारित नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने माना कि प्राथमिकी भारतीय न्याय संहिता की धारा 125 और 329 (3) के तहत अपराधों के बुनियादी घटकों का खुलासा करने में भी विफल रही। न्यायालय ने टिप्पणी की कि “केवल ड्रोन की बरामदगी” आपराधिक अतिचार के समान नहीं हो सकती। न्यायालय ने यह भी बताया कि शारीरिक चोट, संपत्ति के नुकसान या किसी पहचान योग्य शिकायतकर्ता का कोई आरोप नहीं था और इस मामले को तुच्छता का एक “उत्कृष्ट उदाहरण” बताया।
न्ययालय ने महत्वपूर्ण रूप से प्रक्रियात्मक खामियों को भी चिन्हित किया और कहा कि आरोपी को प्राथमिकी की प्रति उपलब्ध कराने में विफलता कानूनी सुरक्षा उपायों को कमजोर करती है और इसे केवल इंटरनेट पर अपलोड करके उचित नहीं ठहराया जा सकता।
न्यायालय ने प्रभावी रूप से संकेत दिया कि हर खराबी अपराध नहीं है, और हर तकनीकी चूक आपराधिक कानून लागू करने का आधार नहीं बनती। इसके साथ ही, एक सामान्य ड्रोन घटना एक मार्गदर्शक मिसाल के रूप में विकसित हुई है जो संभवतः देश भर में भविष्य की तकनीक संबंधी दुर्घटनाओं पर कानूनी प्रतिक्रिया को आकार देगी।
दीदार ए हिन्द की रीपोर्ट