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	<title>जरा हटके &#8211; Deedar-E-Hind | Hindi News Portal</title>
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	<description>Hindi News Portal &#38; Urdu NewsPaper</description>
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		<title>अरबपतियों का कसता शिकंज&#8230;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Deedare Hind]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 18 Jan 2024 09:03:44 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जरा हटके]]></category>
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					<description><![CDATA[अरबपतियों का कसता शिकंज&#8230; ऑक्सफेम ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि शीर्ष पांच अरबपतियों की संपत्ति 2020 के बाद से दोगुनी हो गई है। यानी जब कोरोना महामारी की मार से आम जन की अर्थव्यवस्था बिगड़ी, इन अरबपतियों के लिए ये आपदा एक बेहतरीन अवसर साबित हुई।अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संस्था ऑक्सफेम की इस बात के &#8230;]]></description>
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<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">अरबपतियों का कसता शिकंज&#8230;</mark></strong></p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="300" height="168" src="https://deedarehind.com/wp-content/uploads/2024/01/download-2024-01-18T143245.516.jpg" alt="" class="wp-image-72261" /></figure>



<p>ऑक्सफेम ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि शीर्ष पांच अरबपतियों की संपत्ति 2020 के बाद से दोगुनी हो गई है। यानी जब कोरोना महामारी की मार से आम जन की अर्थव्यवस्था बिगड़ी, इन अरबपतियों के लिए ये आपदा एक बेहतरीन अवसर साबित हुई।अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संस्था ऑक्सफेम की इस बात के लिए तारीफ करनी होगी कि हर वर्ष जब स्विट्जरलैंड के शहर दावोस में दुनिया भर के आर्थिक एवं राजनीतिक कर्ता-धर्ता जुटते हैं, तो वह उन्हें आगाह करता है। वह बताता है कि ये कर्ता-धर्ता जिन नीतियों को आगे बढ़ा रहे हैं, वह सबकी खुशहाली लाने के अपने वायदे में लगातार फेल हो रही हैं। ऑक्सफेम तथ्यों के साथ बताता है कि इन नीतियों आर्थिक गैर-बराबरी को किस हद तक बढ़ा दिया है। इस संस्था ने अपनी ताजा रिपोर्ट में विश्व अर्थव्यवस्था पर अरबपतियों के बढ़ते शिकंजे पर रोशनी डाली है। उसने बताया है कि शीर्ष पांच अरबपतियों की संपत्ति 2020 के बाद से दोगुनी हो गई है। यानी जब कोरोना महामारी की मार से आम जन की अर्थव्यवस्था बिगड़ी, इन अरबपतियों के लिए ये आपदा एक बेहतरीन अवसर साबित हुई। ऑक्सफेम ने बताया है कि 2020 के बाद से अरबपतियों की संपत्ति और भी बढ़ गई है, जबकि दुनिया की 60 फीसदी आबादी की आय घट गई है।ऑक्सफेम की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के शीर्ष पांच सबसे अमीर व्यक्तियों- इलॉन मस्क, बर्नार्ड अरनॉल्ट, जेफ बेजोस, लैरी एलिसन और मार्क जकरबर्ग- की संयुक्त संपत्ति साल 2020 के बाद 114 फीसदी या 464 अरब डॉलर से बढ़कर 869 अरब डॉलर हो गई है। ऑक्सफेम ने पाया कि एक अरबपति या तो बड़ी कंपनियां चलाता है या दुनिया की दस सबसे बड़ी कंपनियों में से सात में प्रमुख शेयरधारक होता है। एक अनुमान के मुताबिक शीर्ष 148 कंपनियों ने 1.8 ट्रिलियन डॉलर का मुनाफा कमाया, जो तीन साल के औसत से 52 प्रतिशत अधिक है। इससे शेयरधारकों को भारी रिटर्न मिला, जबकि लाखों श्रमिकों को जीवनयापन संकट का सामना करना पड़ा, क्योंकि महंगाई के कारण वास्तविक रूप से वेतन में कटौती हुई। ऑक्सफेम ने कहा है कि यह असमानता कोई संयोग नहीं है। बल्कि अरबपति वर्ग यह सुनिश्चित कर रहा है मौजूदा व्यवस्था अन्य सभी की कीमत पर उन्हें ज्यादा फायदा पहुंचाएं। यही कारण है कि जहां अरबों लोग महामारी, आर्थिक बदहाली, महंगाई और युद्ध की विभीषिका झेल रहे हैं, वहीं अरबपतियों की संपत्ति में उछाल आ रहा है।</p>



<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">दीदार ए हिन्द की रीपोर्ट</mark></strong></p>
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		<title>चुनावी मकसद से चर्चा?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Deedare Hind]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 18 Jan 2024 09:01:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जरा हटके]]></category>
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					<description><![CDATA[चुनावी मकसद से चर्चा? बहुआयामी गरीबी सूचकांक को एक पूरक पैमाना ही माना गया है। जबकि कैलोरी उपभोग की क्षमता एवं प्रति दिन खर्च क्षमता दुनिया में व्यापक रूप से मान्य कसौटियां हैं, जिन्हें अब भारत में सिरे से नजरअंदाज कर दिया गया है।नीति आयोग ने कई महीने जारी अपनी रिपोर्ट को संभवत: फिर से &#8230;]]></description>
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<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">चुनावी मकसद से चर्चा?</mark></strong></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-full"><img decoding="async" width="259" height="194" src="https://deedarehind.com/wp-content/uploads/2024/01/download-2024-01-18T143043.725.jpg" alt="" class="wp-image-72258" /></figure>
</div>


<p>बहुआयामी गरीबी सूचकांक को एक पूरक पैमाना ही माना गया है। जबकि कैलोरी उपभोग की क्षमता एवं प्रति दिन खर्च क्षमता दुनिया में व्यापक रूप से मान्य कसौटियां हैं, जिन्हें अब भारत में सिरे से नजरअंदाज कर दिया गया है।नीति आयोग ने कई महीने जारी अपनी रिपोर्ट को संभवत: फिर से चर्चा में लाने के लिए ताजा एक डिस्कसन पेपर तैयार किया है। इसे- मल्टीडाइमेंशनल पॉवर्टी इन इंडिया सिंस 2005-06 (भारत में 2005-06 के बाद से बहुआयामी गरीबी) नाम से जारी किया गया है। इसमें पहले वाली रिपोर्ट के इस निष्कर्ष को दोहराया गया है कि 2013-14 से 2022-23 (यानी मोदी सरकार के कार्यकाल में) तक 24 करोड़ 82 लाख लोगों को बहुआयामी गरीबी के पैमाने पर गरीबी से बाहर लाया गया। डिस्कसन पेपर में नई बात सिर्फ यह दावा है कि जिस एल्कायर एंड फॉस्टर (एएफ) विधि से यह रिपोर्ट तैयार की गई, वह वैश्विक रूप से गरीबी मापने का स्वीकृत फॉर्मूला है। जबकि कुछ अर्थशास्त्री इस विधि में मौजूद खामियों के बारे में हो चुके शोध निष्कर्षों का उल्लेख करते हुए उसके सटीक होने पर सवाल उठा चुके हैं। बहरहाल, डिस्कसन पेपर जारी होते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ट्विट किया। उसमें उन्होंने कहा कि यह निष्कर्ष बहुत उत्साहवर्धक है, जो समावेशी विकास के प्रति उनकी सरकार की प्रतिबद्धता को दिखाता है।इस तरह जब देश लोकसभा चुनाव के मोड में प्रवेश कर चुका है, एक पुरानी रिपोर्ट के जरिए सरकार की अच्छी छवि पेश करने वाली सुर्खियां पेश करने अवसर एक बार फिर मेनस्ट्रीम मीडिया को मिला है। इससे सरकार समर्थकों को कुछ टॉकिंग प्वाइंट्स मिलेंगे। उनके शोरगुल के बीच इस मुद्दे की बारीकी में जाने की कोशिशें ना के बराबर होंगी, क्योंकि गरीबी के विमर्श को सायास ढंग से आम चर्चा से बाहर कर दिया गया है। नतीजतन, जिससे विपक्ष भी कोई सार्थक बहस खड़ी करने में अक्षम दिखता है। वरना, विशेषज्ञ यह बात पहले ही चर्चा में ला चुके हैं कि बहुआयामी पैमाना इनपुट आधारित विधि है, जिसमें जो सेवाएं किसी स्थान पर उपलब्ध हैं (भले संबंधित व्यक्ति उसका उपभोग करने में अक्षम हो), उन्हें उसकी गरीबी मापने की कसौटी मान लिया जाता है। इसीलिए इसे एक पूरक पैमाना ही माना गया है। जबकि कैलोरी उपभोग की क्षमता एवं प्रति दिन खर्च क्षमता व्यापक रूप से मान्य कसौटियां हैं, जिन्हें अब भारत में सिरे से नजरअंदाज कर दिया गया है।</p>



<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">दीदार ए हिन्द की रीपोर्ट</mark></strong></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>कर्ज के बोझ तले दबता जा रहा आज का भारत..</title>
		<link>http://deedarehind.com/%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9c-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a5%8b%e0%a4%9d-%e0%a4%a4%e0%a4%b2%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a4%ac%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%be/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Deedare Hind]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 18 Jan 2024 08:59:40 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जरा हटके]]></category>
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					<description><![CDATA[कर्ज के बोझ तले दबता जा रहा आज का भारत.. सरकार का क़र्ज़ इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी आमदनी कितनी है और ख़र्चे कितने हैं। अगर ख़र्चा आमदनी से ज़्यादा है तो सरकार को उधार या क़र्ज़ लेना पड़ता है। इसका सीधा असर सरकार के राजकोषीय घाटे पर पड़ता है। आज जो &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">कर्ज के बोझ तले दबता जा रहा आज का भारत..</mark></strong></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-full"><img decoding="async" width="235" height="214" src="https://deedarehind.com/wp-content/uploads/2024/01/download-2024-01-18T142837.895.jpg" alt="" class="wp-image-72255" /></figure>
</div>


<p>सरकार का क़र्ज़ इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी आमदनी कितनी है और ख़र्चे कितने हैं। अगर ख़र्चा आमदनी से ज़्यादा है तो सरकार को उधार या क़र्ज़ लेना पड़ता है। इसका सीधा असर सरकार के राजकोषीय घाटे पर पड़ता है। आज जो इतना कर्ज़ लिया जा रहा है इसका बोझ सिर्फ़ हमारे और आपके ऊपर नहीं आएगा। भविष्य में इसका बोझ हमारी संतानों पर भी आएगा। अगर अर्थव्यवस्था में उत्पादन नहीं बढ़ेगा, रोज़गार नहीं बढ़ेगा और हमारे देश में अमीर-ग़रीब के बीच असमानता कम नहीं होगी तो आपको क़र्ज़ लेना ही पड़ेगा। और ये दुर्भाग्यपूर्ण है। भविष्य में अगर सरकार का कर्ज कम नहीं हुआ तो निजी कंपनियां ज्यादा ब्याज चुकाने के लिए मजबूर होंगी। तब निवेश और कम हो जाएगा। इसे यूं समझिए अगर अर्थव्&#x200d;यवस्&#x200d;था के मुकाबले विदेशी कर्ज बढ़ता है तो देश की सॉवरेन रेटिंग पर असर पड़ता है। खासतौर से विकासशील अर्थव्&#x200d;यवस्&#x200d;थाओं पर इसका ज्&#x200d;यादा असर पड़ सकता है। कर्ज को चुकाने में अगर डिफॉल्&#x200d;ट किया गया तो न सिर्फ देश की सॉवरेन रेटिंग पर असर पड़ेगा, बल्कि विदेशी निवेशकों में भी निगेटिव संदेश जाएगा और इनवेस्&#x200d;टमेंट गिर सकता है। इसका असर उद्योगों और प्रोजेक्&#x200d;ट पर भी पड़ेगा, जिससे रोजगार के अवसर कम हो जाएंगे।</p>



<p>-प्रियंका सौरभ-</p>



<p>दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का खिताब अपने नाम लिए भारत सरकार और इसके राज्यों पर बहुत ज्यादा कर्ज हो गया है। अगर इसे कम नहीं किया गया तो हमें इस अच्छे मौके का पूरा फायदा नहीं उठा पाएंगे। 2019-20 में महामारी से पहले ही ये कर्ज बढ़ने लगा था जो तब से कम नहीं हुआ है। इस कर्ज के ज्यादा होने का एक कारण ये है कि निजी कंपनियां मुट्ठी ठीक से खोल नहीं रही हैं। वो अर्थव्यवस्था में कम पैसा लगा रही हैं। बैंकों और कंपनियों ने अपने लोन कम कर दिए जिससे निजी निवेश कम हो गया है। इसी वजह से सरकार ने ज्यादा पैसा लगाकर अर्थव्यवस्था को बढ़ाने की कोशिश की और कर्ज बढ़ता गया। भविष्य में अगर सरकार का कर्ज कम नहीं हुआ तो निजी कंपनियां ज्यादा ब्याज चुकाने के लिए मजबूर होंगी। तब निवेश और कम हो जाएगा। इसे यूं समझिए अगर अर्थव्&#x200d;यवस्&#x200d;था के मुकाबले विदेशी कर्ज बढ़ता है तो देश की सॉवरेन रेटिंग पर असर पड़ता है। खासतौर से विकासशील अर्थव्&#x200d;यवस्&#x200d;थाओं पर इसका ज्&#x200d;यादा असर पड़ सकता है। कर्ज को चुकाने में अगर डिफॉल्&#x200d;ट किया गया तो न सिर्फ देश की सॉवरेन रेटिंग पर असर पड़ेगा, बल्कि विदेशी निवेशकों में भी निगेटिव संदेश जाएगा और इनवेस्&#x200d;टमेंट गिर सकता है। इसका असर उद्योगों और प्रोजेक्&#x200d;ट पर भी पड़ेगा, जिससे रोजगार के अवसर कम हो जाएंगे। इसके अलावा कर्ज डिफॉल्&#x200d;ट होने पर उसे चुकाना महंगा हो जाएगा, जिससे सरकारी खजाने पर भी असर पड़ सकता है और सरकार आम आदमी के लिए चलाई जाने वाली योजनाओं में कटौती को मजबूर हो सकती है।</p>



<p>सरकार का क़र्ज़ इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी आमदनी कितनी है और ख़र्चे कितने हैं। अगर ख़र्चा आमदनी से ज़्यादा है तो सरकार को उधार या क़र्ज़ लेना पड़ता है। इसका सीधा असर सरकार के राजकोषीय घाटे पर पड़ता है। 1980 के बाद हमें बजट में राजस्व घाटा हो रहा है। राजस्व घाटे का मतलब है जो आपका वर्तमान ख़र्च है वो आपके राजस्व से ज़्यादा है। इसलिए मौजूदा ख़र्च को चलाने के लिए के लिए क़र्ज़ लेना पड़ रहा है। राजस्व घाटे का मतलब है कि जिसके लिए आप उधार ले रहे हैं उस पर रिटर्न नहीं आएगा। जैसे- सब्सिडी या डिफ़ेंस पर होने वाला ख़र्च। बजट का एक बड़ा हिस्सा इन पर ख़र्च होता है और फिर हमारा क़र्ज़ बढ़ता चला जाता है। आज जो इतना कर्ज़ लिया जा रहा है इसका बोझ सिर्फ़ हमारे और आपके ऊपर नहीं आएगा। भविष्य में इसका बोझ हमारी संतानों पर भी आएगा। अगर अर्थव्यवस्था में उत्पादन नहीं बढ़ेगा, रोज़गार नहीं बढ़ेगा और हमारे देश में अमीर-ग़रीब के बीच असमानता कम नहीं होगी तो आपको क़र्ज़ लेना ही पड़ेगा। और ये दुर्भाग्यपूर्ण है। आज का भारत &#8216;ऋण संकट की समस्या&#8217; का सामना कर रहा है। इस &#8216;संकट&#8217; को वर्तमान ऋण की मात्रा के संदर्भ में नहीं, बल्कि बढ़ते सरकारी (घरेलू, बाह्य और कॉर्पोरेट) ऋण और अन्य मैक्रो समुच्चय (विकास, रोजगार, मुद्रास्फीति से लेकर वित्तीय ऋण विस्तार तक) के बीच बड़े रुझान और व्यापक आर्थिक संबंध के रूप में देखा जाना चाहिए। सरकार को इन चुनौतियों से निपटने के लिए गंभीर राजकोषीय समेकन उपाय करने की आवश्यकता होगी, बजाय इसके कि आईएमएफ ने जो चेतावनी दी है, उसे नकार दिया जाए। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारत को कर्ज के बारे में आगाह किया है।</p>



<p></p>



<p>आईएमएफ को अंदेशा है कि मीडियम टर्म में भारत का सरकारी कर्ज बढ़कर ऐसे स्तर पर पहुंच सकता है, जो देश की जीडीपी से ज्यादा हो सकता है। मतलब कुल सरकारी कर्ज देश की जीडीपी के 100 फीसदी से ज्यादा हो सकता है। पिछले तीन वर्षों में पूंजीगत व्यय से प्रेरित सरकारी खर्च ने अधिक पूंजी निर्माण (विकास के लिए निजी पूंजी निवेश को आकर्षित करने के लिए) की अनुमति नहीं दी है। कमजोर सकल स्थिर पूंजी निर्माण आंकड़े इसे दर्शाते हैं। मेरे लिए तो यह और भी बड़ी चिंता का विषय है। यदि सरकार बड़ा खर्च कर रही है और निजी निवेश के माध्यम से विकास को आकर्षित करने/उत्तरोत्तर आगे बढ़ाने के लिए अधिक उधार ले रही है, और ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है (निजी निवेश बेहद कमजोर बना हुआ है), तो सरकार मूल रूप से खर्च करने की कीमत पर अधिक कर्ज अर्जित कर रही है। यह संकट या बड़े पैमाने पर ऋण आवश्यकताओं के लिए भविष्य में उपयोगी उधार लेने की संभावना को बर्बाद करना और खतरे में डालना है। समस्या यह है कि ये सभी बढ़ते खर्च वास्तव में उच्च विकास की ओर ले जा रहे हैं और मानव पूंजी विकास के लिए आवश्यक सामाजिक/कल्याण व्यय की कीमत पर आ रहे हैं। राजकोषीय घाटे से उत्पन्न होने वाले &#8216;छिपे हुए ऋण&#8217; की संभावना हमेशा बनी रहती है जिसे आधिकारिक आंकड़ों में &#8216;चुपचाप छिपाया जाता है&#8217; और &#8216;जिसका हिसाब नहीं दिया जाता है।&#8217; संकट के समय में, &#8216;छिपे हुए ऋण&#8217; के आंकड़े किसी अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर सकते हैं।</p>



<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-cyan-blue-color">दीदार ए हिन्द की रीपोर्ट</mark></strong></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>वित्तीय वर्ष 2024 में भारत की आर्थिक विकास दर का सही आंकलन नहीं कर पा रहे हैं विदेशी वित्तीय संस्थान.</title>
		<link>http://deedarehind.com/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b7-2024-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%86/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Deedare Hind]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 18 Jan 2024 08:57:18 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जरा हटके]]></category>
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					<description><![CDATA[वित्तीय वर्ष 2024 में भारत की आर्थिक विकास दर का सही आंकलन नहीं कर पा रहे हैं विदेशी वित्तीय संस्थान. -प्रहलाद सबनानी- वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद के बारे में विदेशी वित्तीय संस्थान अभी भी व्यावहारिक रूख नहीं अपना पा रहे हैं। विभिन्न वित्तीय संस्थानों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2023-24 में &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">वित्तीय वर्ष 2024 में भारत की आर्थिक विकास दर का सही आंकलन नहीं कर पा रहे हैं विदेशी वित्तीय संस्थान.</mark></strong></p>



<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-cyan-blue-color">-प्रहलाद सबनानी-</mark></strong></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="283" height="178" src="https://deedarehind.com/wp-content/uploads/2024/01/download-2024-01-18T141651.300.jpg" alt="" class="wp-image-72252" /></figure>
</div>


<p>वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद के बारे में विदेशी वित्तीय संस्थान अभी भी व्यावहारिक रूख नहीं अपना पा रहे हैं। विभिन्न वित्तीय संस्थानों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत की आर्थिक विकास दर 6 से 6.5 प्रतिशत रह सकती है। जबकि वित्तीय वर्ष 2023-24 की प्रथम तिमाही में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है और द्वितीय तिमाही में 7.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है। आगामी दो तिमाही में भारत की आर्थिक विकास दर यदि 5.5 प्रतिशत भी रहती है तो यह पूरे वित्तीय वर्ष के लिये 6.5 प्रतिशत से ऊपर रहने वाली है। परंतु, केंद्र सरकार एवं कुछ राज्य सरकारों द्वारा किए जा रहे पूंजीगत खर्चों, ग्रामीण इलाकों के बढ़ रही उत्पादों की मांग, विभिन्न कम्पनियों की लगातार बढ़ रही लाभप्रदता, वस्तु एवं सेवा कर संग्रहण एवं प्रत्यक्ष कर संग्रहण में वृद्धि दर को देखते हुए इस बात की प्रबल सम्भावना है कि आगामी दो तिमाही में भारत की विकास दर निश्चित रूप से 5.5 प्रतिशत से अधिक रहने वाली है। इस प्रकार वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत की आर्थिक विकास दर 7 प्रतिशत से ऊपर रहने की प्रबल संभावनाएं बनती दिखाई दे रही हैं।<br>अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं विश्व बैंक के अनुमानों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 6.3 प्रतिशत की वृद्धि दर रह सकती है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी इकरा के अनुसार यह 6.5 प्रतिशत, एशिया विकास बैंक एवं बार्कलेस एवं प्राइस वॉटर कूपर्स के अनुसार यह 6.7 प्रतिशत, डेलाईट इंडिया द्वारा यह 7 प्रतिशत रहने की सम्भावना व्यक्त की गई है। इसके विपरीत विभिन्न भारतीय वित्तीय संस्थान भारत की विकास दर के बारे में लगातार अपने अनुमानों को सुधारते हुए इसे पूरे वित्तीय वर्ष के लिए 7 प्रतिशत से अधिक बता रहे हैं। आर्थिक अनुसंधान विभाग, भारतीय स्टेट बैंक द्वारा वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत की आर्थिक विकास दर 7.2 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है, भारतीय रिजर्व बैंक ने भी इसके 7 प्रतिशत से अधिक रहने की सम्भावना जताई है तथा अभी हाल ही में राष्ट्रीय सांख्यिकीय संस्थान द्वारा इसके 7.3 प्रतिशत रहने की सम्भावना जताई गई है।<br>दरअसल, अभी हाल ही के समय में भारतीय अर्थव्यवस्था के बहुत तेजी से डिजिटलीकरण हुआ है। प्रत्यक्ष सुविधा हस्तांतरण योजना (डीबीटी) के अंतर्गत भारतीय नागरिकों के 50 करोड़ से अधिक जमा खाते विभिन्न बैकों में खोले गए हैं। इन जमा खातों के खुलने से भारत के इन नागरिकों का वित्तीय रिकार्ड बनता जा रहा है। उदाहरण के लिए, एक चाय वाला यदि दिन भर में चाय के 200 कप, 10 रुपए प्रति कप की दर से बेचता है तो वह दिन भर में 2000 रुपए की आय का अर्जन कर लेता है। भारत में लगातार बढ़ रहे डिजिटलीकरण के चलते वह दुकानदार अपने ग्राहकों से चाय के एवज में नकद रोकड़ राशि न लेकर अपने खाते में सीधे यह राशि जमा कराता है। उसके बैंक खाते में प्रति माह 60, 000 रुपए की राशि जमा हो जाती है एवं पूरे वर्ष भर में 720, 000 रुपए की उसके बैंक खाते में जमा हो जाती है। इससे, उस दुकानदार का क्रेडिट रिकार्ड बनता जा रहा है। एक चाय वाला दुकानदार यदि साल भर में 720, 000 रुपए की बिक्री कर लेता है तो उसके इस रिकार्ड को बैंक द्वारा अच्छा रिकार्ड मानते हुए उसे ऋण प्रदान करने हेतु पात्र ग्राहक मानते हुए उसके व्यापार को और आगे बढ़ाने के उद्देश्य से आसानी से उस दुकानदार को ऋण प्रदान कर दिया जाता है। इस प्रकार, कई सूक्ष्म आकार के व्यवसायी लघु एवं मध्यम आकार के व्यवसायी बनते जा रहे हैं। छोटे छोटे व्यापारियों के व्यवसाय का आकार बढ़ने के कारण यह व्यवसायी रोजगार के लाखों नए अवसर निर्मित करने में सफल हो रहे हैं।<br>दूसरे, भारत में धार्मिक पर्यटन में जबरदस्त उच्छाल देखने में आ रहा है। वाराणसी में भगवान शिव का कोरिडोर बनने के बाद से वाराणसी में 7 करोड़ से अधिक श्रद्धालु प्रभु शिव के दर्शन करने हेतु पहुंचे हैं। इसी प्रकार उज्जैन में महाकाल लोक के बनने के बाद से उज्जैन नगर में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या कई गुणा बढ़ गई है। गुजरात में सरदार वल्लभ भाई पटेल की आदम कद भव्य प्रतिमा स्थापित होने के बाद से उस स्थल पर प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में पर्यटक पहुंच रहे हैं। इसी प्रकार, हरिद्वार, वृंदावन, तिरुपति बालाजी, वैष्णो देवी आदि धार्मिक स्थलों के दर्शन करने हेतु करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु प्रतिवर्ष इन स्थलों पर धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से पहुंचते हैं। अभी हाल ही में अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह एवं लक्षद्वीप को भी पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जा रहा है। इससे न केवल भारत से बल्कि विदेशों से भी पर्यटकों की संख्या में अपार वृद्धि होने जा रही है। किसी भी देश में पर्यटन के बढ़ने से छोटे छोटे व्यवसाय, होटेल एवं परिवहन आदि जैसे क्षेत्रों में कार्य करने वाले व्यापारियों के व्यवसाय में अपार वृद्धि होती है एवं इन क्षेत्रों में रोजगार के लाखों नए अवसर निर्मित होते हैं। इससे भी देश के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि होती है।<br>तीसरे, यह भी केवल भारत की ही विशेषता है कि विभिन त्यौहारों एवं शादी जैसे समारोहों पर भारतीय नागरिक दिल खोलकर पैसा खर्च करते हैं। इससे त्यौहारों एवं शादी के मौसम में व्यापार के विभिन्न क्षेत्रों में व्यापार में अतुलनीय वृद्धि दृष्टिगोचर होती है। जैसे दीपावली त्यौहार के समय भारत में नागरिकों के बीच विभिन्न नए उत्पादों की खरीद के लिए जैसे आपस में होड़ सी लग जाती है। भारत में लाखों करोड़ रुपए का व्यापार दीपावली त्यौहार के समय में होता है। इसी प्रकार की स्थिति शादियों के मौसम में भी पाई जाती है। संभवत: विदेशी वित्तीय संस्थान भारत में हो रहे इस तरह के उक्त वर्णित परिवर्तनों को समझ नहीं पा रहे हैं एवं केवल पारंपरिक विधि से ही सकल घरेलू उत्पाद को आंकने का प्रयास कर रहे हैं। इसलिए भारत की विकास दर के संबंच में विभिन्न विदेशी संस्थानों के अनुमान गलत साबित हो रहे हैं।<br>(सेवा निवृत्त उप महाप्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक)</p>



<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">दीदार ए हिन्द की रीपोर्ट</mark></strong></p>
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		<title>जानें कब सुधरेंगी हवाई और रेल यात्रा.</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Deedare Hind]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 18 Jan 2024 08:45:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जरा हटके]]></category>
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					<description><![CDATA[जानें कब सुधरेंगी हवाई और रेल यात्रा. -ऋतुपर्ण दवे- आम जन की यात्राओं की सुविधाएं के नाम पर संचालित सरकारी सेवाएं बेहद गैर जिम्मेदाराना व्यव्हार कर रही हैं। चाहे हवाई यात्रा हो या रेल, हर रोज करोड़ों लोग परेशान हो रहे हैं। इनमें वो भी हैं जिन्हें हर हालत में अपनी नियत तिथि पर वांछित &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">जानें कब सुधरेंगी हवाई और रेल यात्रा.</mark></strong></p>



<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-cyan-blue-color">-ऋतुपर्ण दवे-</mark></strong></p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="300" height="168" src="https://deedarehind.com/wp-content/uploads/2024/01/download-2024-01-18T141509.503.jpg" alt="" class="wp-image-72248" /></figure>



<p>आम जन की यात्राओं की सुविधाएं के नाम पर संचालित सरकारी सेवाएं बेहद गैर जिम्मेदाराना व्यव्हार कर रही हैं। चाहे हवाई यात्रा हो या रेल, हर रोज करोड़ों लोग परेशान हो रहे हैं। इनमें वो भी हैं जिन्हें हर हालत में अपनी नियत तिथि पर वांछित गंतव्य पर पहुंचना होता है और वो भी जिन्हें दो कनेक्टिविटी के सहारे यात्रा पूरी करनी पड़ती है। भारत में सही समय पर यात्रा पूरी होने की न तो किसी की गारण्टी है और न ही कोई इस बदहाली को चुनौती ही दे सकता है।हर रोज पूरे देश में बड़ी संख्या में हवाई और रेल सेवाएं लेट-लतीफी का शिकार हो रही हैंष जिसके जवाब में प्री रिकॉर्डेड चार शब्द ‘असुविधा के लिए खेद है’ काफी हैं।इन दिनों तो घने कोहरे के चलते स्थिति और भी बद से बदतर है।<br>देश में औसतन ढ़ाई से तीन हजार फ्लाइट्स रोजाना लगभग 4, 56, 000 यात्रियों को मुकाम तक पहुंचाती हैं। वहीं 8 अक्टूबर 2023 का एक आंकड़ा बताता है कि रेलवे रोजाना 22, 593 ट्रेनें चलाता है जिनमें 13, 452 यात्री ट्रेनोंसे औसतन 2.40 करोड़ यात्री सफर करते हैं, बांकी 9141 मालगाडि़यां हैं। बसों और निजी वाहनों से सफर करने वालों की संख्या जोड़ दें यह कई गुना बढ़ जाएगी।<br>अभीहवाई और रेल सेवा कोहरे के चलते ऐसी चरमराई हुई है कि पूछिए मत। अकेले दिल्ली से रोजाना 1400 उड़ानें घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय उड़ानें संचालित होती हैं। कोहरे से हालात यूं हैं किकई-कईदिन सूर्य देव दर्शन नहीं देते, कोहरा छाया रहता है। ऐसे क्या टेक ऑफ, क्या लैण्डसभी उड़ानों को रद्द, रिशेड्यूल या डायवर्ट करना पड़ता है। पूरे देश का यही हाल है। अभी दो दिन पहले 13 जनवरी को घने कोहरे केचलते मुंबई-गुवाहाटी उड़ान को बांग्लादेश के ढाका में इमरजेंसी लैंडिंग खातिर मजबूर होना पड़ा। इसमें फंसे यात्री बिना पासपोर्ट के अंतरराष्ट्रीय सीमा तो पार कर गएलेकिन कई घण्टे हवाई जहाज में ही बैठे रहे।विदेशी धरती पर कैसे उतरते?कोहरे की मार से हमारे सभी हवाई अड्डे प्रभावित हैं।ऐसे में मंहगी और सही वक्त पर पहुंचने खातिर हवाई यात्राओं के भी कोई मायने नहीं।<br>कमोवेश इससे भी बदतर हालत यात्री ट्रेनों की है। कोहरे की मार से रोजाना आधे से ज्यादा रेल यात्री परेशान होते हैं।जहां कोरोना के चलते रद्द कई ट्रेन शुरू नहीं हो पाईं वहीं जो चलीं वो भी कई तरह के सुधार और सुविधाओं के नाम पर रद्द, लेटया रिशेड्यूलहो रही हैं। बिलासपुर जोन नेतो ट्रेनों के रद्द करनेका देश में कीर्तिमान ही बना डाला। यहांकुछ सालोंमें हजारों जोड़ी ट्रेन रद्द हुईं।कोयला, दूसरी खदानों व पॉवर सेक्टर वाले बिलासपुर जोन में आने-जाने वाले लाखों यात्रियों को लेट-लतीफी या एकाएक कैंसल होने से असहनीय परेशानी होती है। अभी यात्री गाड़ियो खातिरकोहरे काबहाना है और मालगाड़ियां पूरी रफ्तार में हैं।<br>आखिरहवाई और रेल यात्रियों की सुध लेगा कौन?उनकी परिस्थिति और मानसिक स्थिति को कौन समझेगा? आगे की यात्रा के लिए दो-तीन घण्टे की मार्जिन रख, कनेक्टिंग फ्लाइट्स या ट्रेन की कंफर्म टिकट लेकर महीनों पहले अपना कार्यक्रम तय कर चुके लोग ऐन वक्त पर चार शब्दों के जवाब‘असुविधा के लिए खेद है’ से निपटा दिए जाते हैं और भुक्तभोगी अपना सिर नोचने के कुछ नहीं कर पाता।<br>चाहे विमानन सेक्टर हो या रेलवे इन्हें पता होता है किकब से कब कोहरा तो कब बारिश और कब गर्मी होगी। लेकिन जानकर भी न निपट पाने की ढ़िठाई इस हाईटेक और आर्टीफीसियल इण्टेलीजेंस के जमाने में समझ से बाहर है। कोहरे से कम विजिबिलिटी में विमान उड़ाने और उतारने के लिए पायलटों को सीएटी-3बी जैसे प्रशिक्षित होनाजरूरी है। इसमें मुख्य पायलट को 2, 500 घंटे और को पायलट को 500 घंटे उड़ान का अनुभव हो।यह अत्याधिक खर्चीला है। कंपनियों को पायलट को सवैतनिक छुट्टी देकर दूसरे खर्च भी उठाने पड़ते हैं जो लाखों में होता है जो नहीं होता। कैट-3बी तकनीक के रनवे भी अलग बनते हैं ताकिघने कोहरे में भी विमान उतर सकें।ये देश में ज्यादा नहीं हैं। इसमें एडवांस्ड इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम (आइएलएस), एयरफील्ड ग्राउंड लाइट्स (एजीएल), मौसम संबंधी उपकरण जैसे ट्रांसमीसोमीटर, ऑटोमैटिक वेदर ऑब्जर्वेटरी स्टेशन (एडब्ल्यूओएस), सरफेस मूवमेंट रडार (एसएमआर) और अन्य नेविगेशनल उपकरण लगते हैं।सबका संचालन व रख-रखाव कठिन और खर्चीला है। अभी देश में कुल छःदिल्ली, जयपुर, अमृतसर, लखनऊ, कोलकाता और कैम्पागौड़ा हवाई अड्डेकैट-3-बी तकनीक से लैस हैं।सोचिए, दिल्ली में कैट-3-बी रनवे केवल एक है। इनमें50 मीटर की विजिबिलिटी पर विमान का उतराऔर 125 मीटर की विजिबिलिटी पर टेक-ऑफ किया जा सकता है।अभी अमूमन लैंडिंग खातिर 550 मीटर और टेक-ऑफ हेतु 300 मीटर विजिबिलिटीजरूरी है।<br>यही स्थिति रेलवे की है। इसी 4 जनवरी को सरकार के अधीन डीडी न्यूज ने अपनी वेबसाइट परशीर्षक ‘कोहरे से ट्रेन यात्रा नहीं होगी प्रभावित, करीब 20 हजार फॉग डिवाइस से लैस हुई भारतीय रेलवे’ से एक जानकारी अपलोड की। जिसमें बताया कि कोहरे से ट्रेन यात्रा प्रभावितनहीं होगी, क्योंकि20 हजार फॉग डिवाइस से भारतीय रेलवे लैस हो चुका है। आगे लिखा कि कोहरे के दौरान सुचारू रेल परिचालन सुनिश्चित करने के लिए 19, 742 जीपीएस आधारित पोर्टेबल फॉग पास डिवाइस उपलब्ध कराए हैं।ये लोको पायलटों को सिग्नल, लेवल क्रॉसिंग गेट और स्थायी गति प्रतिबंधों जैसे चिन्हित स्थलों के स्थान के बारे में ऑन-बोर्ड वास्तविक समय की जानकारी प्रदान कराता है। इस पहल को ट्रेन सेवाओं की विश्वसनीयता में सुधार, देरी को कम करने और समग्र यात्री सुरक्षा को बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी बताया।मध्य रेलवे में 560, पूर्वी रेलवे में 1103, पूर्व मध्य रेलवे में 1891, पूर्वी तटीय रेलवे में 375, उत्तर रेलवे में 4491, उत्तर मध्य रेलवे में 1289, पूर्वोत्तर रेलवे में 1762, पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे में 1101, उत्तर पश्चिम रेलवे में 992, दक्षिण मध्य रेलवे में 1120, दक्षिण पूर्व रेलवे में 2955, दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे में 997, दक्षिण पश्चिम रेलवे में 60 और पश्चिम मध्य रेलवे में 1046 फॉग पास डिवाइस उपलब्धि का दावा भी किया।<br>लेकिन मौजूदा वास्तविकता से भला कौन रू-ब-रू नहीं है? सैकड़ों ट्रेनें रोजाना घण्टों क्या पूरे दिन की लेट-लतीफी सेरेंग रही हैं। हवाई सेवा की स्थिति किसी से छुपी नहीं है। उधर रेलवे, वरिष्ठ नागरिकों और कुछ जरूरी काम करने वालों को कोरोना से पहले दी जाने वाली छूट को समाप्त कर चुका है। लाखों करोड़ रुपए के बजट वाले रेलवे ने वरिष्ठ नागरिकों की छूट समाप्तिसेबीते वर्ष केवल 1667 करोड़ रुपये की भारी रकम बचा, बचत का ढ़िंढ़ोरा पीट रही है।वहीं यह भी कि प्रत्येक रेल यात्री पर औसतन 53 फीसदी सब्सिडी देती हैजिसकी वर्ष 2019-20 की रकम 59000 करोड़रुपए है।<br>पता नहीं केन्द्र का यह बताने का मकसद क्या है? ऐसे में क्या एक रेल यात्री जो हर रोज सफर नहीं करता है उसकी छूट का प्रचार क्यों? जबकि अब तो एक से एक मंहगी और तेज ट्रेनें पटरी पर आ गई हैं। इशारा समझ तो नहीं आ रहा है? लेकिन सवाल यही कि क्या मुसीबत और लेट-लतीफी का मारा रेल यात्री इस एहसान तक का हकदार नहीं?जहां तमाम राज्य अपने नागरिकों को सुविधा, छूट, मदद और योजनाओं के नाम बड़ी मदद या नकद तक दे रहे हैं। वहीं सवाल यह भी कि तकनीक के इस दौर में जहां हम चन्द्रयान और सूर्य के रहस्य के लिए अनजाने अंतरिक्ष में अपने यान सफलता पूर्वक भेज देते हैं लेकिनअपनी धरती, अपने आसमान के बीच का धुंधलका दूर करने के जतन में हर साल सैकड़ों करोड़ बरबाद करने के बाद भी कुछ हासिल नहीं कर पा रहे हैं?हैरानी है कि सरकारीनियंत्रण की दोनों बड़ी ट्रेवल एजेंसी यानीएयर पोर्ट और ट्रेनों के संचालन में बाधा बने मामूली से कोहरे से नहीं निपट पानाचिंताजनक, दुखी और परेशान करने वाला है।</p>



<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">दीदार ए हिन्द की रीपोर्ट</mark></strong></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>सहयोगियों के साथ सीट साझा करने में कांग्रेस अधिक उदार..</title>
		<link>http://deedarehind.com/%e0%a4%b8%e0%a4%b9%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%9f-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%9d%e0%a4%be/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Deedare Hind]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 18 Jan 2024 08:44:10 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जरा हटके]]></category>
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					<description><![CDATA[सहयोगियों के साथ सीट साझा करने में कांग्रेस अधिक उदार.. -कल्याणी शंकर- राम मंदिर के उद्घाटन को लेकर विपक्ष मुश्किल में है। विपक्षी गठबंधन ने इस कार्यक्रम का बहिष्कार करने का फैसला किया है। इसमें भाग लेना केवल उनके कथन का समर्थन करेगा क्योंकि यह भाजपा के लिए एक राजनीतिक तमाशा है। जबकि कांग्रेस इस &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">सहयोगियों के साथ सीट साझा करने में कांग्रेस अधिक उदार..</mark></strong></p>



<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-cyan-blue-color">-कल्याणी शंकर-</mark></strong></p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="300" height="168" src="https://deedarehind.com/wp-content/uploads/2024/01/download-2024-01-18T141309.742.jpg" alt="" class="wp-image-72245" /></figure>



<p>राम मंदिर के उद्घाटन को लेकर विपक्ष मुश्किल में है। विपक्षी गठबंधन ने इस कार्यक्रम का बहिष्कार करने का फैसला किया है। इसमें भाग लेना केवल उनके कथन का समर्थन करेगा क्योंकि यह भाजपा के लिए एक राजनीतिक तमाशा है। जबकि कांग्रेस इस मुद्दे पर आंतरिक रूप से विभाजित थी, उसने निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया। सीपीआई (एम) और सीपीआई नेताओं ने विनम्रतापूर्वक निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया है।</p>



<p>बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा संयोजक का पद ठुकरा दिये जाने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को विपक्षी इंडिया गठबंधन द्वारा उसका अध्यक्ष बनाये जाने के फैसले से कांग्रेस पार्टी की जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं। चुनाव से पहले साझेदारी बनाना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन असली चुनौती सीटों पर सहमति बनाने में है। यह सवाल बना हुआ है कि इंडिया ब्लॉक के लिए सीट-बंटवारा कितना मुश्किल है, और क्या विपक्ष चुनाव से पहले बाधाओं को दूर कर सकता है?</p>



<p>कांग्रेस पार्टी गठबंधन के सभी घटक दलों को संतुष्ट करने वाला समाधान खोजने के लिए प्रयासरत है जो 28 दलों के गठबंधन का नेतृत्व कर रही है। गठबंधन ने भाजपा-विरोधी विपक्षी वोटों को विभाजित होने से रोकने के लिए भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए एक ही उम्मीदवार को नामांकित करने का फैसला किया है।</p>



<p>हालांकि, कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन खुद को एक मुश्किल स्थिति में पाता है क्योंकि अधिकांश क्षेत्रीय दल अधिक सीटों के लिए कड़ी सौदेबाजी कर रहे हैं, जो केवल कांग्रेस पार्टी के हितों की कीमत पर ही हो सकता है। मल्लिकार्जुन खड़गे ने पार्टी को इस दुविधा को दूर करने के लिए अन्य सहयोगियों के साथ बातचीत शुरू करने का निर्देश दिया है। यह इंगित करता है कि कांग्रेस इस बार सहयोगियों को समायोजित करने के लिए कम सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार है।</p>



<p>कांग्रेस पार्टी ने चुनाव से पहले कई राज्यों में अन्य राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन किया था। यह तमिलनाडु में डीएमके के साथ जुड़ गया, जबकि बिहार में राजद और जद (यू), और झारखंड में झामुमो के साथ। हालांकि ये गठबंधन पहले से ही जारी हैं, कांग्रेस जानती है कि कुछ राज्यों, विशेषकर दिल्ली, पंजाब, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में सीट-बंटवारा चुनौतीपूर्ण होगा।</p>



<p>कांग्रेस पार्टी फिलहाल अपनी पार्टी और सहयोगियों की जरूरतों को पूरा करने के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। उसके सामने अपने क्षेत्रीय साझेदारों के साथ सकारात्मक रिश्ते बनाये रखने की चुनौती है। पार्टी इस बात को लेकर सतर्क है कि बातचीत से साझेदारों के बीच कोई मनमुटाव न हो।</p>



<p>कांग्रेस की स्थानीय इकाइयों में साझेदारों को सीटें देने को लेकर शीर्ष नेतृत्व के बीच मतभेद हैं। वास्तविकता को देखते हुए, खड़गे ने पार्टी की गठबंधन समिति को सहयोगियों को समायोजित करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने का निर्देश दिया है। उन्होंने इंडिया गुट के साथ समन्वय के लिए विपक्षी नेताओं से भी संपर्क किया है। कांग्रेस लोकसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ लड़ेगी। तेरह राज्यों में भाजपा के साथ वह सीधे लड़ेगी जबकि उसका मुकाबला आंध्र प्रदेश, केरल, ओडिशा और तेलंगाना में गैर-भाजपा दलों से है। कांग्रेस को यह तय करना है कि वह बंगाल और त्रिपुरा में सीपीआई (एम) के साथ गठबंधन करेगी या नहीं।</p>



<p>अतीत में, कांग्रेस का दिल्ली और पंजाब में महत्वपूर्ण राजनीतिक दबदबा था। हालांकि, आम आदमी पार्टी (आप) कांग्रेस के प्रभुत्व के खिलाफ एक मजबूत दावेदार के रूप में उभरी है, क्योंकि अब वह दोनों राज्यों में सत्ता पर काबिज है। जहां कांग्रेस का लक्ष्य दिल्ली में चार और पंजाब में सात सीटें हैं, वहीं सत्तारूढ़ आप पार्टी सीटों में बड़ी हिस्सेदारी चाहती है। इसके अतिरिक्त आप की गोवा, हरियाणा और गुजरात जैसे अन्य राज्यों में भी चुनाव लड़ने की योजना है।</p>



<p>इसी तरह उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बिहार में राजद और जद (यू), जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी; और तमिलनाडु में डी.एम.के. का पलड़ा भारी रहने की उम्मीद है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने राज्य की कमान संभालेंगी।</p>



<p>2019 के चुनावों के दौरान, कांग्रेस 421सीटों पर चुनाव लड़ी, लेकिन केवल 52 पर जीत हासिल कर सकी। उसने कुछ राज्यों में गठबंधन बनाया और कम सीटों पर चुनाव लड़ा, जैसे बिहार में नौ, झारखंड में सात, कर्नाटक में 21, महाराष्ट्र में 25 और तमिलनाडु में नौ। हालांकि, उसने उत्तर प्रदेश की 80 में से 70 सीटों पर चुनाव लड़ा। कांग्रेस के अपने दम पर भाजपा को हराने की संभावना कम है। वह सरकार बनाने के लिए आवश्यक 272सीटों पर स्वतंत्र रूप से चुनाव नहीं लड़ेगी, बल्कि 255सीटों पर चुनाव लड़ सकती है, जो अब तक की सबसे कम संख्या है। इसकी सबसे अच्छी स्थिति 125 सीटें जीतना है।</p>



<p>एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में कांग्रेस को भाजपा को सीधे चुनौती देने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। 190 से अधिक सीटों पर मजबूत नेताओं को निर्वाचन क्षेत्रों से मैदान में उतारा जाना है। पार्टी को जमीनी स्तर पर बूथ कमेटियों को मजबूत करने की भी जरूरत है।</p>



<p>कांग्रेस नेता राहुल गांधी की अगुवाई में निकली भारत जोड़ो न्याय यात्रा पर भी विवाद खड़ा हो गया है। जद (यू) के नेता के सी त्यागी ने सवाल किया कि कांग्रेस ने इसे विपक्षी गुट के सहयोगियों के साथ संयुक्त यात्रा क्यों नहीं बनाया। हालांकि कांग्रेस ने अपने सहयोगियों को आमंत्रित किया, लेकिन वे कैसे प्रतिक्रिया देंगे यह अभी भी अनिश्चित है। सफल यात्रा का श्रेय राहुल गांधी को जायेगा।</p>



<p>राम मंदिर के उद्घाटन को लेकर विपक्ष मुश्किल में है। विपक्षी गठबंधन ने इस कार्यक्रम का बहिष्कार करने का फैसला किया है। इसमें भाग लेना केवल उनके कथन का समर्थन करेगा क्योंकि यह भाजपा के लिए एक राजनीतिक तमाशा है। जबकि कांग्रेस इस मुद्दे पर आंतरिक रूप से विभाजित थी, उसने निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया। सीपीआई (एम) और सीपीआई नेताओं ने विनम्रतापूर्वक निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया है।</p>



<p>हालांकि चुनावी सर्वेक्षणों में भविष्यवाणी की गई है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी चुनाव जीतेंगे, लेकिन अगर विपक्ष एकजुट रहता है तो उनके जीतने की अभी भी कम संभावना है। यदि विपक्षी दल अधिकतम संभव सीट बंटवारे के समझौते के आधार पर लड़ते हैं तो वे 2004 के लोकसभा परिणाम दोहरा सकते हैं।</p>



<p><strong>दीदार ए हिन्द की रीपोर्ट</strong></p>
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			</item>
		<item>
		<title>नया साल, नई उम्मीदें, नए सपने, नए लक्ष्य…</title>
		<link>http://deedarehind.com/%e0%a4%a8%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%a8%e0%a4%88-%e0%a4%89%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a8%e0%a4%8f-%e0%a4%b8%e0%a4%aa%e0%a4%a8/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Deedare Hind]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 31 Dec 2023 09:36:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जरा हटके]]></category>
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					<description><![CDATA[नया साल, नई उम्मीदें, नए सपने, नए लक्ष्य… नए साल पर अपनी आशाएँ रखना हमारे लिए बहुत अच्छी बात है, हमें यह भी समझने की ज़रूरत है कि आशाओं के साथ निराशाएँ भी आती हैं। जीवन द्वंद्व का खेल है और नया साल भी इसका अपवाद नहीं है। यदि हम &#8216;बीते वर्ष&#8217; पर ईमानदारी से &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">नया साल, नई उम्मीदें, नए सपने, नए लक्ष्य…</mark></strong></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="280" height="180" src="https://deedarehind.com/wp-content/uploads/2023/12/download-2023-12-31T150530.447.jpg" alt="" class="wp-image-70954" /></figure>
</div>


<p>नए साल पर अपनी आशाएँ रखना हमारे लिए बहुत अच्छी बात है, हमें यह भी समझने की ज़रूरत है कि आशाओं के साथ निराशाएँ भी आती हैं। जीवन द्वंद्व का खेल है और नया साल भी इसका अपवाद नहीं है। यदि हम &#8216;बीते वर्ष&#8217; पर ईमानदारी से विचार करें, तो हमें एहसास होगा कि हालांकि यह आवश्यक नहीं है कि वर्ष ने वह प्रदान किया हो जो हमने उससे चाहा था, लेकिन इसने हमें कुछ बहुमूल्य सीख और अनुभव अवश्य दिए। ये अलग से बहुत महत्वपूर्ण नहीं लग सकते हैं, लेकिन संभवतः ये प्रकृति का हमें उस उपहार के लिए तैयार करने का तरीका है जो उसने हमारे लिए रखा है जिसे वह अपनी समय सीमा में वितरित करेगी। साथ ही, अगर साल ने हमसे कुछ बहुत कीमती चीज़ छीन ली है, तो निश्चित रूप से उसने उसकी समान मात्रा में भरपाई भी कर दी है। वर्ष के अंत में, हमें एहसास होता है कि हमारी बैलेंस शीट काफी उचित है। तो, आइए हम आने वाले वर्ष में इस विश्वास के साथ प्रवेश करें कि नए साल का जादू यह जानने में निहित है कि चाहे कुछ भी हो, हर निराशा के लिए मुआवजा होगा, हर इच्छा की पूर्ति के लिए एक सीख होगी….</p>



<p>-प्रियंका सौरभ-</p>



<p>नया साल हमारे लिए नया समय ही नहीं बल्कि नए समय के साथ नई उम्मीदें, नए सपने, नया लक्ष्य, नए विचार और नए इरादे लेकर आता है। हम सभी को नए साल की शुरुआत अच्छे और नेक कामों के साथ करनी चाहिए। नया साल हमारे मन के भीतर आशा की नई किरण जगाता है। नया साल तो हर साल आता है लेकिन क्या कभी हमनें ये सोचने की कोशिश की है कि हमने इस साल क्या नया और खास किया जिससे ये साल हमारे लिए यादगार साल बन जाए। हम अपनी जिंदगी में बहुत से उतार-चढ़ाव का सामना करते हैं और ये जरूरी नहीं है कि हर व्यक्ति के लिए हर साल अच्छा ही जाए या हर साल हर किसी के लिए बुरा ही जाए लेकिन इसका मतलब ये नहीं होता है कि हम बीते कल को भूल जाएं। बीता हुआ कल तो हमें आज के लिए और आने वाले कल के लिए सीख देकर जाता है कि कैसे हम अपने कल को आज से बेहतर बना सकते हैं-</p>



<p>बीत गया ये साल तो, देकर सुख-दुःख मीत।<br>क्या पता? क्या है बुना? नई भोर ने गीत। ।<br>जो खोया वो सोचकर, होना नहीं उदास।<br>जब तक साँसे ये चले, रख खुशियों की आस। ।</p>



<p>हर साल, साल-दर-साल, हम अपने दिल में एक गीत और कदमों में वसंत के साथ नए साल में प्रवेश करते हैं। हमें विश्वास है कि जादुई वर्ष अपने साथ हमारी सभी समस्याओं का समाधान लाएगा और हमारी सभी इच्छाएँ पूरी करेगा। चाहे वह सपनों का घर हो, सपनों का प्रस्ताव हो, सपनों की नौकरी हो, सपनों का साथी हो, सपनों का अवसर हो… और भी बहुत कुछ बेहतर हो। लेकिन जैसे-जैसे साल शुरू होता है और हम जो कुछ भी सामने आता है उससे निपटते हैं, नए साल की नवीनता, नए संकल्प, नई शुरुआत पहली तिमाही तक लुप्त होने लगती है। वर्ष के मध्य तक हम बहुत अधिक सामान्यता और कई फीकी आशाओं की चपेट में होते हैं, जो उस वादे से बहुत दूर है जिसके साथ हमने शुरुआत की थी। और आखिरी तिमाही तक हम अपनी वास्तविकता से इतने अभिभूत हो जाते हैं कि हम साल खत्म होने का इंतजार नहीं कर सकते। हम वर्तमान वर्ष को छोड़ते हुए और एक और &#8216;नया साल&#8217; मनाने के लिए पूरी तरह तैयार हो जाते हैं और शुभकामनाएं बांटते है-</p>



<p>बाँट रहे शुभकामना, मंगल हो नववर्ष।<br>आनंद उत्कर्ष बढ़े, हर चेहरे हो हर्ष। ।<br>गर्वित होकर जिंदगी, लिखे अमर अभिलेख।<br>सौरभ ऐसी खींचिए, सुंदर जीवन रेख। ।</p>



<p>नववर्ष वह समय है जब हमें अचानक लगता है कि, ओह, एक साल बीत गया। हम कुछ पलों के लिए स्तब्ध हो जाते हैं कि समय कितनी जल्दी बीत जाता है, और फिर हम वापिस अपने काम में व्यस्त हो जाते हैं। मजेे की बात यह है कि ऐसा साल में लगभग एक बार तो होता ही है। यदि हम आश्चर्य के इन क्षणों की गहराई में जाएं, तब हम पाएंगे कि हमारे भीतर कुछ ऐसा है जो सभी घटनाओं को साक्षी भाव से देख रहा है। हमारे भीतर का यह साक्षी भाव अपरिवर्तित रहता है और इसीलिए हम समय के साथ बदलती घटनाओं को देख पाते हैं। जीवन की वे सभी घटनाएं जो बीत चुकी हैं, एक स्वप्न बन गई हैं। जीवन के इस स्वप्न-जैसे स्वभाव को समझना ही ज्ञान है। यह स्वप्न अभी इस क्षण भी चल रहा है। जब हम यह बात समझते हैं तब हमारे भीतर से एक प्रबल शक्ति का उदय होता है और फिर घटनाएं व परिस्थितियां हमें हिलाती नहीं हैं। हालांकि, घटनाओं का भी जीवन में अपना महत्व है। हमें घटनाओं से सीखना चाहिए और आगे बढ़ते रहना चाहिए। नया साल नई उम्मीदें, नए सपने, नए लक्ष्य और नए आइडिया की उम्मीद देता है, इसलिए सभी लोग खुशी से बिना किसी मलाल के इसका स्वागत करते हैं-</p>



<p>आते जाते साल है, करना नहीं मलाल।<br>सौरभ एक दुआ करे, रहे सभी खुशहाल। ।<br>छोटी सी है जिंदगी, बैर भुलाये मीत।<br>नई भोर का स्वागतम, प्रेम बढ़ाये प्रीत। ।</p>



<p>हालाँकि नए साल पर अपनी आशाएँ रखना हमारे लिए बहुत अच्छी बात है, हमें यह समझने की ज़रूरत है कि आशाओं के साथ निराशाएँ भी आती हैं। जीवन द्वंद्व का खेल है और नया साल भी इसका अपवाद नहीं है। यदि हम &#8216;बीते वर्ष&#8217; पर ईमानदारी से विचार करें, तो हमें एहसास होगा कि यह आवश्यक नहीं है कि वर्ष ने वह प्रदान किया हो जो हमने उससे चाहा था, लेकिन इसने हमें कुछ बहुमूल्य सीख और अनुभव अवश्य दिए। ये अलग से बहुत महत्वपूर्ण नहीं लग सकते हैं, लेकिन ये संभवतः प्रकृति का हमें उस उपहार के लिए तैयार करने का तरीका है जो उसने हमारे लिए रखा है जिसे वह अपनी समय सीमा में वितरित करेगी। साथ ही, अगर साल ने हमसे कुछ बहुत कीमती चीज़ छीन ली है, तो निश्चित रूप से उसने उसकी समान मात्रा में भरपाई भी कर दी है। वर्ष के अंत में, हमें एहसास होता है कि हमारी बैलेंस शीट काफी उचित है। तो, आइए हम आने वाले वर्ष में इस विश्वास के साथ प्रवेश करें कि नए साल का जादू यह जानने में निहित है कि चाहे कुछ भी हो, हर निराशा के लिए मुआवजा होगा, हर इच्छा की पूर्ति के लिए एक सीख होगी, दर्द-दुखों का अंत होगा, अपनेपन की धूप होगी-</p>



<p>छँटे कुहासा मौन का, निखरे मन का रूप।<br>सब रिश्तों में खिल उठे, अपनेपन की धूप। ।<br>दर्द-दुखों का अंत हो, विपदाएं हो दूर।<br>कोई भी न हो कहीं, रोने को मजबूर। ।</p>



<p>नए साल पर अपने लिए लक्ष्य निर्धारित कर लें। छात्र हों या नौकरीपेशा, सभी के लिए कोई न कोई लक्ष्य होना जरूरी होता है। भविष्य को बेहतर बनाने के लिए क्या कर सकते हैं और किस दिशा में प्रयास करना है, इन सब का निर्धारण करने के बाद उसे पूरा करने का संकल्प ले लें। आपका संकल्प हमेशा लक्ष्य को पूरा करने की याद दिलाता रहेगा। सभी &#8216;नए साल&#8217; को जीवनकाल से जोड़ते हैं और हमारा जीवनकाल आशाओं और निराशाओं, सफलताओं और असफलताओं, खुशियों और दुखों के बारे में है और यह वर्ष भी कम जादुई नहीं होगा। तो इस वर्ष आप अपने संकल्पों को कैसे पूरा कर सकते हैं? इस बारे सोच समझकर आगे बढिये, दूसरों से समर्थन मांगें, अपने मित्रों और परिवार से आपका उत्साह बढ़ाने के लिए कहें। उन्हें अपने लक्ष्य बताएं और आप क्या हासिल करना चाहते हैं। अपने लिए एक इनाम प्रणाली बनाएं, अल्पकालिक लक्ष्य निर्धारित करें और उन्हें पूरा करने के लिए स्वयं को पुरस्कृत करें। अपने ऊपर दया कीजिये, कोई भी एकदम सही नहीं होता। अपने आप को कोसने की बजाय गहरी सांस लें और नव उत्कर्ष के प्रयास करते रहें-</p>



<p>खोल दीजिये राज सब, करिये नव उत्कर्ष।<br>चेतन अवचेतन खिले, सौरभ इस नववर्ष। ।<br>हँसी-खुशी, सुख-शांति हो, खुशियां हो जीवंत।<br>मन की सूखी डाल पर, खिले सौरभ बसंत। ।</p>



<p>ऐसा माना जाता है कि साल का पहला दिन अगर उत्साह और खुशी के साथ मनाया जाए, तो पूरा साल इसी उत्साह और खुशियों के साथ बीतेगा। हालांकि भारतीय परम्परा के अनुसार नया साल एक नई शुरुआत को दर्शाता है और हमेशा आगे बढऩे की सीख देता है। पुराने साल में हमने जो भी किया, सीखा, सफल या असफल हुए उससे सीख लेकर, एक नई उम्मीद के साथ आगे बढऩा चाहिए। ताकि इस वर्ष की एक सुखद पहचान बने-</p>



<p>खिली-खिली हो जिंदगी, महक उठे अरमान।<br>आशा है नव साल की, सुखद बने पहचान। ।<br>छेड़ रही है प्यार की, मीठी-मीठी तान।<br>नए साल के पँख पर, खुशबू भरे उड़ान। ।</p>



<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">दीदार ए हिन्द की रेपोर्ट</mark></strong></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>विचार परिवर्तन, अवसरवादिता, मजबूरी या महज़ अफ़वाह?</title>
		<link>http://deedarehind.com/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%a8-%e0%a4%85%e0%a4%b5%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%bf/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Deedare Hind]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 31 Dec 2023 09:34:36 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जरा हटके]]></category>
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					<description><![CDATA[विचार परिवर्तन, अवसरवादिता, मजबूरी या महज़ अफ़वाह? -तनवीर जाफ़री- ईसाई समुदाय से जुड़े क्रिसमस त्योहार ने इस वर्ष कुछ विशेष सुर्ख़ियां बटोरीं। इसकी दो वजह थीं। एक तो देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ईसाई समुदाय को संबोधित करते हुये ईसाई समुदाय के साथ &#8216;अपना आत्मीयता का रिश्ता&#8217; बताना। दूसरे राष्ट्रीय स्वयं संघ द्वारा क्रिसमस &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">विचार परिवर्तन, अवसरवादिता, मजबूरी या महज़ अफ़वाह?</mark></strong></p>



<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-cyan-blue-color">-तनवीर जाफ़री-</mark></strong></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="298" height="169" src="https://deedarehind.com/wp-content/uploads/2023/12/download-2023-12-31T150352.085.jpg" alt="" class="wp-image-70951" /></figure>
</div>


<p>ईसाई समुदाय से जुड़े क्रिसमस त्योहार ने इस वर्ष कुछ विशेष सुर्ख़ियां बटोरीं। इसकी दो वजह थीं। एक तो देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ईसाई समुदाय को संबोधित करते हुये ईसाई समुदाय के साथ &#8216;अपना आत्मीयता का रिश्ता&#8217; बताना। दूसरे राष्ट्रीय स्वयं संघ द्वारा क्रिसमस के दिन यानी 25 दिसंबर को कश्मीर से कन्याकुमारी तक क्रिसमस भोज का आयोजन करने की &#8216;ख़बर का प्रचारित&#8217; होना। ग़ौर तलब है कि गत 25 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में क्रिसमस के त्योहार पर ईसाई समुदाय को संबोधित किया। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने कहा कि ईसाई समुदाय के साथ -&#8216;मेरा बहुत पुराना और आत्मीय नाता रहा है&#8217;। उन्होंने कहा कि -&#8216;गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए वे ईसाई समुदाय के लोगों व उनके नेताओं से अक्सर मिलते रहते थे&#8217;। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि ईसाई समुदाय के साथ उनका बहुत पुराना और क़रीबी रिश्ता है। उन्होंने कहा कि क्रिसमस वह दिन है जब हम यीशु मसीह के जन्म का जश्न मनाते हैं। यह ईसा मसीह के जीवन संदेशों और मूल्यों को याद करने का भी एक पावन अवसर है&#8217;। इसी दौरान यह ख़बर भी देश के कई प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ कश्मीर से कन्याकुमारी तक क्रिसमस भोज का आयोजन करने जा रहा है। यह पहली बार था जब भाजपा सरकार के केंद्रीय सत्ता में रहते हुये इस तरह के आयोजन की ख़बरें प्रचारित हो रही थीं। इन्हीं ख़बरों में अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय राज्यमंत्री जॉन बारला द्वारा मेघालय हाउस में कथित तौर पर क्रिसमस भोज की मेज़बानी करने, राष्ट्रीय ईसाई मंच की ओर से उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के चर्च प्रमुखों को आमंत्रित करने तथा संघ के कई प्रमुख नेताओं के इस आयोजन में शामिल होने की बातें विभिन्न प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित हुईं।</p>



<p>इन ख़बरों पर लोगों की ख़ास तवज्जोह की वजह यह भी थी कि पिछले कुछ महीनों से देश का मणिपुर राज्य ईसाई विरोधी हिंसा से जूझ रहा है। ख़बरों के अनुसार मणिपुर में ईसाईयों के दर्जनों चर्च भी जला दिये गये हैं। पिछले कुछ समय से देश के और भी कई इलाक़ों से पादरियों, चर्चों और ईसाइयों के कुछ संस्थानों पर हमले की घटनाएँ सामने आई हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री का ईसाई प्रेम दर्शाने और संघ द्वारा क्रिसमस भोज दिये जाने की &#8216;ख़बर&#8217; के प्रचारित व प्रकाशित होने पर आम लोगों का नज़र रखना भी स्वभाविक ही था। दरअसल राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक व पूर्व सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उर्फ़ गुरूजी ने 1966 में प्रकाशित अपनी एक पुस्तक &#8216;बंच ऑफ़ थॉट्स &#8216; में ऐसी कई विवादित बातें लिखी हैं जिनसे शायद संघ अब स्वयं को असहज महसूस कर रहा है और इनसे पीछा छुड़ाना चाहता है। ग़ौरतलब है कि 1940 से लेकर लगातार 33 वर्षों (अपनी मृत्यु ) तक संघ प्रमुख रहे माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उर्फ़ गुरूजी ने अपनी पुस्तक &#8216;बंच ऑफ़ थॉट्स &#8216; में लिखा है कि ‘उन्हें नाज़ी जर्मनी से प्रेरणा मिली है&#8217;। उन्होंने भारतीय ईसाइयों को ब्लडसकर या ख़ून चूसने वाला बताया और मुसलमानों, ईसाइयों और कम्युनिस्टों को देश के लिए आंतरिक ख़तरा क़रार दिया है। ” इसी पुस्तक के दूसरे भाग में ‘राष्ट्र और उसकी समस्याएँ’ नाम का चैप्टर है। इसमें ‘आंतरिक ख़तरे’. नामक शीर्षक के अध्याय में मुसलमान, ईसाई और कम्युनिस्ट नामक उपशीर्षक हैं जिनमें विस्तृत तौर पर यह बताया गया है कि किस प्रकार यही तीन समुदाय भारत के लिए ख़तरा पैदा करते हैं।</p>



<p>परन्तु ऐसा लगता है कि 2014 में संघ संरक्षित भारतीय जनता पार्टी की सरकार के केंद्रीय सत्ता में आने के बाद संघ, भाजपा व इससे जुड़े कई प्रमुख नेता &#8216;बंच ऑफ़ थॉट्स &#8216; में प्रकाशित &#8216;गुरु जी &#8216; के इन विवादित बयानों से अब अपना पीछा छुड़ाना चाह रहे हैं। उदाहरण के तौर पर केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह ने कई वर्ष पूर्व बी बी सी को एक साक्षात्कार दिया। साक्षात्कार लेने वाले थे बी बी सी के वरिष्ठ पत्रकार राजेश जोशी। जोशी ने जब राजनाथ सिंह से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक व पूर्व सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर के उन विवादित विचारों के बारे में जानना चाहा जो उन्होंने अपनी पुस्तक &#8216;बंच ऑफ़ थॉट्स &#8216; में व्यक्त किये हैं। और जिसमें उन्होंने ईसाई, मुस्लिम व कम्मुनिस्ट को देश के सबसे बड़े दुश्मन के रूप में रेखांकित किया है। इस प्रश्न के उत्तर में राजनाथ सिंह ने बड़े ही आश्चर्यजनक रूप से गुरूजी के ऐसे किसी &#8216;विचार &#8216; के प्रति पूरी तरह अपनी अनभिज्ञता जताई। इसी तरह दिसंबर 2015 में भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन महासचिव व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रवक्ता राम माधव ने अल-जज़ीरा टेलीविज़न चैनल को दर्शकों से भरे हुए एक हॉल में एक इंटरव्यू दिया। इसमें जब राम माधव से पूछा गया कि &#8216;क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर मुसलमानों, ईसाइयों और कम्युनिस्टों को भारत के लिए आंतरिक ख़तरा मानते थे? क्या गोलवलकर ईसाइयों को ख़ून चूसने वाला मानते थे? इस सवाल के जवाब में राम माधव ने भी इस बात का खंडन किया। बावजूद इसके कि इस पुस्तक के अब तक अनेक एडिशन प्रकाशित हो चुके हैं उसके बावजूद राम माधव जैसे संघ के रणनीतिकार व पूर्व प्रवक्ता जब साफ़ तौर पर &#8216;गुरूजी &#8216; के इन विचारों से पूरी तरह पल्ला झाड़ने लग जायें इसका आख़िर क्या अर्थ निकाला जाना चाहिये? इसी साक्षात्कार में अलजज़ीरा पत्रकार ने राम माधव से यह भी पूछा था कि -“संघ के पूर्व प्रमुख गोलवलकर को आप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना प्रेरणा स्रोत बताया है। लेकिन गोलवलकर कहते हैं कि ‘उन्हें नाज़ी जर्मनी से प्रेरणा मिली है, साथ ही उन्होंने भारतीय ईसाइयों को ब्लडसकर या ख़ून चूसने वाला बताया और मुसलमानों, ईसाइयों और कम्युनिस्टों को देश के लिए आंतरिक ख़तरा क़रार दिया है?” इस पर राम माधव यह कहकर लीपापोती करने लगे कि आपने उन्हें &#8216;मिसकोट &#8216; किया&#8217;। जबकि यह पुस्तक दस्तावेज़ी शक्ल में हर जगह उपलब्ध है।</p>



<p>रहा सवाल बीते दिनों कश्मीर से केरल तक संघ द्वारा क्रिसमस पार्टी के आयोजन से जुड़ी ख़बरों का, तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर कार्यवाह मनमोहन वैद्य द्वारा तो इस तरह के किसी भी आयोजन को सिरे से ख़ारिज करते हुए यह कहा गया है कि इस तरह के किसी भी कार्यक्रम की कोई योजना नहीं है और जो आयोजन किए भी जा रहे हैं, उनका संघ से कोई संबंध नहीं है और उसे संघ से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। परन्तु प्रधानमंत्री द्वारा क्रिश्चियन प्रेम दर्शाने और संघ द्वारा या संघ के कुछ नेताओं या भाजपा मंत्रियों द्वारा क्रिसमस के अवसर पर पार्टी आयोजित करने की सत्य या अर्ध सत्य ख़बरों के आलोक में यह सवाल उठना तो स्वभाविक है ही कि &#8216;गुरूजी&#8217; के विवादित विचारों से पीछा छुड़ाने की कोशिश संघ का विचार परिवर्तन है, अवसरवादिता, मजबूरी या महज़ क़यास या अफ़वाह?</p>



<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">दीदार ए हिन्द की रेपोर्ट</mark></strong></p>
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			</item>
		<item>
		<title>डीपफेक पर लगाम जरूरी,.</title>
		<link>http://deedarehind.com/%e0%a4%a1%e0%a5%80%e0%a4%aa%e0%a4%ab%e0%a5%87%e0%a4%95-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%9c%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%80/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Deedare Hind]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 31 Dec 2023 09:32:07 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जरा हटके]]></category>
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					<description><![CDATA[डीपफेक पर लगाम जरूरी,. भारत में भी डीपफेक का इस्तेमाल कर ऐसे लोगों को निशाना बनाया जा रहा है, जो सेलिब्रिटी हैं या फिर राजनीति से ताल्लुक रखते हैं। निर्विवाद रूप से यह नई तकनीक का दुरुपयोग है। यह एक तरह की आपराधिक गतिविधि भी है, जिस पर रोक लगाना अनिवार्य है। सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">डीपफेक पर लगाम जरूरी,.</mark></strong></p>



<p>भारत में भी डीपफेक का इस्तेमाल कर ऐसे लोगों को निशाना बनाया जा रहा है, जो सेलिब्रिटी हैं या फिर राजनीति से ताल्लुक रखते हैं। निर्विवाद रूप से यह नई तकनीक का दुरुपयोग है। यह एक तरह की आपराधिक गतिविधि भी है, जिस पर रोक लगाना अनिवार्य है। सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स को इसे रोकने की जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी। भारत सरकार के बारे में यह आम धारणा ठोस रूप ले चुकी है कि वह हर माध्यम और संस्था पर अपना शिकंजा कसना चाहती है। एक दूसरी धारणा यह है कि उसकी ऐसी हर कार्रवाई दलगत नजरिए से एकतरफा होती है। यही कारण है कि डीपफेक के बारे में सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स के लिए उसकी जारी ताजा एडवाइजरी ने कई हलकों में गहरी आशंकाओं को जन्म दिया है। वरना, डीपफेक तकनीक को लेकर चिंताएं सारी दुनिया में हैं। लगभग सभी देशों में आर्टिफिशिलय इंटेलीजेंस (एआई) तकनीक को विनियमित करने पर विचार हो रहा है। ऐसे में भारत सरकार भी ऐसे कदम उठाए, यह लाजिमी है। लेकिन उसके ऐसे कदम से समाज के एक हिस्से अंदेशे गहरा जाते हैं, तो उसका कारण सिर्फ सरकार का अपना रिकॉर्ड है। बहरहाल, केंद्र ने डीपफेक समस्या को लेकर एक एडवाइजरी जारी की है। उसने सभी सोशल मीडिया कंपनियों को सूचना प्रौद्योगिकी नियमों का पालन करने की सलाह दी है। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय एक एड़वाइजरी जारी कर चुका है। ताजा एडवाइजरी में मंत्रालय ने कहा कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को यूजर्स को आईटी नियमों के तहत प्रतिबंधित कंटेंट को प्रकाशित ना करने के बारे में जागरूक करना चाहिए। यूजर्स को फर्जी वीडियो, मैसेज या कंटेंट डालने से रोकने का काम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का है। मकसद यह है कि ऐसी गतिविधि से अन्य यूजर्स को नुकसान ना हो। यह बताना भी इन्हीं प्लैटफॉर्म्स का दायित्व है कि आईटी कानून के नियम का पालन नहीं करने पर यूजर्स के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। बीते नवंबर में भी केंद्र ने एक आदेश जारी कर डीपफेक वीडियो की पहचान करने और उन्हें हटाने के लिए कहा था। यह सच है कि दुनिया के कई दूसरे देशों की ही तरह भारत में भी डीपफेक का इस्तेमाल कर ऐसे लोगों को निशाना बनाया जा रहा है, जो सेलिब्रिटी हैं या फिर राजनीति से ताल्लुक रखते हैं। निर्विवाद रूप से यह नई तकनीक का दुरुपयोग है। यह एक तरह की आपराधिक गतिविधि भी है, जिस पर रोक लगाना अनिवार्य है। सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स को इसे रोकने की जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी।</p>



<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">दीदार ए हिन्द की रेपोर्ट</mark></strong></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>नीतीश बचेंगे या खत्म होंगे?</title>
		<link>http://deedarehind.com/%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%b6-%e0%a4%ac%e0%a4%9a%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%87-%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%96%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%82%e0%a4%97/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Deedare Hind]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 31 Dec 2023 09:31:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जरा हटके]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://deedarehind.com/?p=70944</guid>

					<description><![CDATA[नीतीश बचेंगे या खत्म होंगे? बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सामने अस्तित्व का संकट है। वे राष्ट्रीय जनता दल के साथ मिल कर सरकार चला रहे हैं लेकिन राजद की ओर से उनको कमजोर करने की कोशिश हो रही है। वे भाजपा के साथ जाना चाहते हैं लेकिन भाजपा को भी पूरी तरह से &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">नीतीश बचेंगे या खत्म होंगे?</mark></strong></p>


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<figure class="aligncenter size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="300" height="168" src="https://deedarehind.com/wp-content/uploads/2023/12/download-2023-12-31T150022.022.jpg" alt="" class="wp-image-70945" /></figure>
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<p>बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सामने अस्तित्व का संकट है। वे राष्ट्रीय जनता दल के साथ मिल कर सरकार चला रहे हैं लेकिन राजद की ओर से उनको कमजोर करने की कोशिश हो रही है। वे भाजपा के साथ जाना चाहते हैं लेकिन भाजपा को भी पूरी तरह से सरेंडर चाहिए। जानकार सूत्रों का कहना है कि राजद और भाजपा दोनों बिहार की राजनीति से नीतीश फैक्टर को खत्म करना चाहते हैं। असल में बिहार की राजनीति में पिछले करीब तीन दशक से नीतीश कुमार एक धुरी बने हुए हैं और वह भी बिना किसी मजबूत जातीय आधार के। उन्होंने 1994 में समता पार्टी बनाई थी और तब से वे बिहार के राजनीति के सबसे अहम किरदार हैं। लेकिन अब दोनों बड़ी पार्टियां- राजद और भाजपा उनको खत्म करना चाहते हैं। उन्होंने अपनी ओर से ऐलान किया है कि 2025 का विधानसभा चुनाव तेजस्वी यादव के चेहरे पर लड़ा जाएगा। लेकिन बताया जा रहा है कि लालू प्रसाद चाहते हैं कि नीतीश अभी तुरंत तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाएं। यह भी कहा जा रहा है कि पिछले साल अगस्त में जब नीतीश ने भाजपा को छोड़ा था तब लालू प्रसाद के साथ उनका समझौता हुआ था कि वे एक साल में तेजस्वी को गद्दी सौंप देंगे। सो, लालू की ओर से नीतीश पर भारी दबाव है। लालू परिवार के कई सदस्य राज्य की सत्ता का केंद्र बने हैं, इससे भी नीतीश को समस्या है। इसके अलावा लालू की पार्टी के विधायक और मंत्री जैसे सुनील सिंह, चंद्रशेखर, सुधाकर सिंह आदि लगातार नीतीश के खिलाफ बयान दे रहे हैं। लालू प्रसाद को लग रहा है कि अगर तेजस्वी अभी सीएम नहीं बने तो बेटे को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर देखने की उनकी हसरत पूरी नहीं होगी और अगर नीतीश फैक्टर बने रहे तो मंडल, समाजवादी और पिछड़ों की राजनीति पूरी तरह से राजद के हाथ में नहीं आएगी। दूसरी ओर भाजपा ने नीतीश फैक्टर को खत्म करने की कोशिश 2020 के विधानसभा चुनाव में भी की थी। तब वे भाजपा के साथ ही मिल कर चुनाव लड़ रहे थे लेकिन भाजपा की शह पर चिराग पासवान ने नीतीश की पार्टी के हर उम्मीदवार के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतार दिया था। सोचें, तब नीतीश राजद-कांग्रेस गठबंधन के खिलाफ तो लड़ ही रहे थे लोक जनशक्ति पार्टी के भी खिलाफ लड़ रहे थे, जिसके पीछे भाजपा की ताकत थी। भाजपा के अनेक बड़े नेता लोक जनशक्ति पार्टी की टिकट से चुनाव लड़े थे। फिर भी नीतीश 43 सीट जीत कर आए। लेकिन वे काफी कमजोर हुए और राजद व भाजपा के बाद तीसरे नंबर की पार्टी रह गए। तभी से वे भाजपा से बदला लेना चाहते हैं तो राजद को भी गद्दी नहीं देना चाहते हैं। इस बात को राजद और भाजपा दोनों ने समझा हुआ है। इसलिए कोई मौका नहीं देना चाहता है। भाजपा चाहती है कि वे मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ें, भाजपा का सीएम बनाएं तभी समझौता होगा। नीतीश सीएम रहते हुए तालमेल चाहते हैं और साथ ही लोकसभा के साथ ही विधानसभा का चुनाव कराना चाहते हैं। वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि बाद में भाजपा फिर कोई चिराग पासवान टाइप का दांव न चले तो दूसरी ओर भाजपा चाहती है कि उनकी ऐसी हालत कर दी जाए कि वे फिर गठबंधन बदल नहीं कर सकें। सो, उनके एक तरफ कुआं और दूसरी ओर खाई है। दोनों में से कोई उनको सीएम नहीं रखना चाहता है। ऊपर से उनका स्वास्थ्य बहुत अच्छा नहीं है। तभी यह देखना दिलचस्प है कि वे हर बार की तरह इस बार भी संकट से निकलते हैं या बिहार की राजनीति से नीतीश अध्याय की समापति होती है?</p>



<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">दीदार ए हिन्द की रेपोर्ट</mark></strong></p>
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