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	<title>धर्म &#8211; Deedar-E-Hind | Hindi News Portal</title>
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	<description>Hindi News Portal &#38; Urdu NewsPaper</description>
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		<title>हलाल : फिर मुसलमानों के पीछे भाजपा…</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Deedare Hind]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 19 Nov 2023 08:56:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म]]></category>
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					<description><![CDATA[हलाल : फिर मुसलमानों के पीछे भाजपा… पूरे 43 साल की भाजपा एक दशक तक देश की सत्ता में रहने के बाद भी ये तस्लीम करने के लिए राजी नहीं हैं कि देश में रहने वाले मुसलमान असली भारतीय है। भाजपा उन्हें अभी मलेच्छ और विलायती मानती है। ये बात मै नहीं कहता बल्कि भाजपा &#8230;]]></description>
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<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">हलाल : फिर मुसलमानों के पीछे भाजपा…</mark></strong></p>





<p>पूरे 43 साल की भाजपा एक दशक तक देश की सत्ता में रहने के बाद भी ये तस्लीम करने के लिए राजी नहीं हैं कि देश में रहने वाले मुसलमान असली भारतीय है। भाजपा उन्हें अभी मलेच्छ और विलायती मानती है। ये बात मै नहीं कहता बल्कि भाजपा और देश के भाग्यविधाता खुद कहते और करते नजर आ रहे है। तेलंगाना में चुनाव प्रचार के दौरान केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने ऐलान किया है कि यदि भाजपा सत्ता में आयी तो मुसलमानों को मिलने वाला आरक्षण खत्म कर देगी। इसी तरह उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हलाला प्रमाणीकरण के खिलाफ मुहिम छेड़ दी है।<br>भाजपा को मुसलमानों से पैदायशी चिढ है। भाजपा ने हालही में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में एक भी मुसलमान को प्रत्याशी नहीं बनाया। लोकसभा और राजयसभा में भी भाजपा के आने के बाद अब एक भी भाजपाई मुसलमान नहीं हैं। यानि जहाँ भाजपा का बस चल रहा है वहां भाजपा मुस्लिम विहीन व्यवस्था करती जा रही है। अब देश के विभिन्न सदनों में जितने भी निर्वाचित जन प्रतिनिधि हैं वे गैर भाजपा दलों के हैं। जाहिर है कि भाजपा चाहती है कि भारतीय मुसलमान भारतीय दंड संहिता के हिसाब से नहीं हिन्दू दंड संहिता के अनुरूप आचरण करें, यदि नहीं करेंगे तो उन्हें चैन से नहीं रहने दिया जाएगा। भाजपा वैसे भी देश में समान नागरिक संहिता की पक्षधर है। हमें भी इसमें कोई आपत्ति नहीं लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का हमारा दावा तभी सही साबित हो सकता है जब हम देश में रहने वाले तमाम लोगों को उनकी धार्मिक आस्थाओं के अनुरूप आचरण करने की छूट दें।<br>सबसे पहले तेलंगाना में भाजपा के चुनाव घोषणापत्र और अमित शाह के प्रवचनों पर गौर कीजिये। अमित शाह ने पार्टी का चुनाव घोषणा पत्र जारी करने के बाद चुनावी रैलियों को संबोधित करते हुए कहा कि अगर तेलंगाना में बीजेपी की सरकार बनती है तो वो मुस्लिम आरक्षण को खत्म कर देगी। उन्होंने कहा कि तेलंगाना देश भर में एकमात्र ऐसा राज्य है जहां मुसलमानों को धार्मिक आरक्षण देने का काम हुआ है। बीजेपी ने तय किया है कि हम तेलंगाना में गैर संवैधानिक आरक्षण को समाप्त करके ओबीसी आरक्षण बढ़ाएंगे और एससी-एसटी का भी न्यायिक आरक्षण होगा।तेलंगाना में भाजपा का कोई राजनीतिक वजूद नहीं है, यहां भाजपा अपना कट्टर हिन्दू स्वरूप दिखाकर ध्रुवीकरण करने की नाकाम कोशिश कर रही है। भाजपा ने हमेशा यही सब किया है क्योंकि भाजपा की राजनीति का केंद्र विकास नहीं है। समभाव नहीं है। भाजपा कहने में इसलिए पीछे नहीं हटती क्योंकि जानती है कि न नौ मन तेल होगा और न राधा नाचेगी<br>अब चलिए उत्तर प्रदेश। यहां भाजपा की सरकार को मुस्लिम संस्थाओं द्वारा किया जाने वाला हलाल प्रमाणीकरण स्वीकार्य नहीं है। सरकार ने ऐसी संस्थाओं के प्रमाणपत्रों को गैरकानूनी बताते हुए उनके खिलाफ पुलिस कार्रवाई शुरू कर दी है।उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार हलाल सर्टिफिकेशन से जुड़े उत्पादों की बिक्री पर प्रतिबंध लगा सकती है। सरकार को लगता है कि प्रदेश में कुछ कंपनियों ने हलाल सर्टिफिकेशन के नाम पर धंधा चला रखा है, ऐसी कंपनियां डेयरी, कपड़ा, चीनी, नमकीन, मसाले, और साबुन इत्यादि जैसे उत्पादों को भी हलाल सर्टिफाइड करके बेच रही हैं। इसलिए अब उत्तर प्रदेश सरकार हलाल सर्टिफिकेशन को लेकर कड़े नियम बनाने जा रही ह। आपको बता दें कि हलाल, जिसे हल्लाल भी कहा जाता है, पारंपरिक इस्लामी कानून में वैध (जायज़) है। यह अनुमती भोजन और पेय पर अक्सर लागू होती है।<br>हलाल सर्टिफिकेशन देकर उत्पाद बेचने वाली कंपनियों पर हजरतगंज कोतवाली में एफआईआर दर्ज हुई है. शैलेंद्र शर्मा की शिकायत पर हलाल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड चेन्नई, जमीयत उलेमा हिंद हलाल ट्रस्ट दिल्ली, हलाला काउंसिल आफ इंडिया मुंबई और जमीयत उलेमा महाराष्ट्र मुंबई हलाल सर्टिफिकेशन देकर सामान बेचने वाली अज्ञात कंपनियों के खिलाफ आईपीसी की धाराओं 120बी/153ए/298, 384, 420, 467, 468, 471, 505 में केस दर्ज किया गया है। भारत में कोई सरकारी संस्था ऐसा किसी तरह का सर्टिफिकेशन जारी नहीं करती है। हमारे यहां जो प्रमाणीकरण होता है वो हिन्दू-मुसलमान नहीं देखता। वो केवल सामिष और निरामिष का भेद बताता है। हलाल और हराम का नहीं। लेकिन भाजपा को ये पसंद नहीं क्योंकि ये काम खुद सरकार नहीं कर रही। इसका लाभ सरकार को नहीं हो रहा।<br>आपको बता दूँ कि हलाल खाद्य उपभोक्ता खरीद के वैश्विक उद्योग खरबों अमेरिकी डॉलर का है, जो वैश्विक खाद्य और पेय बाजार के 16.6 प्रतिशत के लिए 6.9 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि के साथ आगे बढ़ रहा है है। हलाल भोजन के लिए यूरोपीय संघ के बाजार में लगभग 15 प्रतिशत की अनुमानित वार्षिक वृद्धि होती है और अनुमानित अमरीकी डालर की कीमत 30 अरब डॉलर है। यानि ये एक अर्थव्यवस्था से जुडी चीज है। हलाल तैयार भोजन ब्रिटेन और अमेरिका में मुसलमानों के लिए एक बढ़ता उपभोक्ता बाजार है और खुदरा विक्रेताओं की बढ़ती संख्या के साथ पेश किया जाता है। शाकाहारी भोजन में हलाल होता है अगर उसमें अल्कोहल न हो। क्या भारत में मुसलमानों कि धार्मिक आस्थाओं के अनुसार हलाल सामग्री का उत्पादन और प्रमाणीकरण नहीं किया जाना चाहिए जबकि भारत में 20 करोड़ मुसलमान रहते हैं? ये मुसलमान बाहर से नहीं आये। ये भारत में ही जन्मे हैं। आज के मुसलमानों कि ही पीढ़ियां थीं जिन्होंने आजादी के समय धर्म के आधार पर बने पाकिस्तान जाने के बजाय भारत में रहना पसंद किया था। क्या ऐसे मुसलमानों को उनकी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार खाने-पीने कि व्यवस्था नहीं की जा सकती?<br>मेरे ख्याल से ये एक सियासी मुद्दा उछाला जा रहा है। इसका देश के विकास, प्रगति, उन्नति-अवनति से कोई लेना-देना नहीं है। उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार को कितने साल हो गए, उसकी नींद अब क्यों टूटी? देश में भाजपा कि सरकार दस साल से है उसने कभी इस विषय में कोई बात क्यों नहीं की? जाहिर है कि भाजपा के पास भविष्य के लिए कोई प्रभावी मुद्दा नहीं बचा है इसलिए भाजपा एक निरर्थक मुद्दे के आधार पर आगे की राजनीती करना चाहती है जो दुर्भाग्यपूर्ण है। सरकार हलाल के बजाय हराम में यकीन रखती है।</p>



<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">दीदार ए हिन्द की रिपोर्ट</mark></strong></p>
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		<title>छठ पूजा (20 नवम्बर) पर विशेष : सूर्य भगवान की उपासना का पर्व है छठ पूजा.</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Deedare Hind]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 19 Nov 2023 08:53:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म]]></category>
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					<description><![CDATA[छठ पूजा (20 नवम्बर) पर विशेष : सूर्य भगवान की उपासना का पर्व है छठ पूजा. छठ पूजा भगवान सूर्य की उपासना का पर्व है। भारत में सूर्य पूजा की परम्परा वैदिक काल से ही रही है। हिंदुओं के सबसे बड़े पर्व दीपावली को पर्वों की माला माना जाता है। पांच दिन तक चलने वाले &#8230;]]></description>
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<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">छठ पूजा (20 नवम्बर) पर विशेष : सूर्य भगवान की उपासना का पर्व है छठ पूजा.</mark></strong></p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="259" height="194" src="https://deedarehind.com/wp-content/uploads/2023/11/download-2023-11-19T142219.724.jpg" alt="" class="wp-image-67901" /></figure>



<p>छठ पूजा भगवान सूर्य की उपासना का पर्व है। भारत में सूर्य पूजा की परम्परा वैदिक काल से ही रही है। हिंदुओं के सबसे बड़े पर्व दीपावली को पर्वों की माला माना जाता है। पांच दिन तक चलने वाले ये पर्व छठ पूजा तक चलते है। उत्तर प्रदेश और बिहार में मनाया जाने वाला यह बेहद अहम पर्व है जो पूरे देश में धूम-धाम से मनाया जाता है। छठ पूजा केवल एक पर्व नहीं है बल्कि महापर्व है जो कुल चार दिन तक चलता है। नहाय खाय से लेकर उगते हुए भगवान सूर्य को अघ्र्य देने तक चलने वाले इस पर्व का अपना एक ऐतिहासिक महत्व है।<br>ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत सूर्य है। इस कारण हिन्दू शास्त्रों में सूर्य को भगवान मानते हैं। सूर्य के बिना कुछ दिन रहने की जरा कल्पना कीजिए। इनका जीवन के लिए इनका रोज उदित होना जरूरी है। कुछ इसी तरह की परिकल्पना के साथ पूर्वोत्तर भारत के लोग छठ महोत्सव के रूप में इनकी आराधना करते हैं। छठ पूजा हिन्दुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है। सामान्यता यह त्योहार बिहार, झारखण्ड और पूर्वी उत्तर-प्रदेश में बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश और बिहार में छठ पूजा को महापर्व घोषित कर छठ पूजा के दिन सरकारी छुट्टी भी लागू कर दी गई है। छठ पूजा का महत्व बहुत ज्यादा है। यह व्रत सूर्य भगवान, उषा, प्रकृति, जल, वायु आदि को समर्पित है। इस व्रत को करने से निःसंतान दंपत्तियों को संतान सुख प्राप्त होता है।<br>छठ पर्व की सांस्कृतिक परम्परा में चार दिन का व्रत रखा जाता है। यह व्रत भैया दूज के तीसरे दिन यानि शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से आरंभ हो जाते है। व्रत के पहले दिन को नहा-खा कहते हैं। जिसका शाब्दिक अर्थ है स्नान के बाद खाना। इस दिन पवित्र नदी में श्रद्धालु स्नान करते हैं। वैसे तो यह पर्व मूल रूप से गृहिणियों द्वारा मनाया जाता है। लेकिन आजकल पुरुष भी इसमें समान रूप से सहयोग देते हैं।<br>छठ पर्व को किसने शुरू किया इसके पीछे कई ऐतिहासिक कहानियां प्रचलित हैं। लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की थी। सप्तमी को सूर्योदय के समय अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशिर्वाद प्राप्त किया था। इसी के उपलक्ष्य में छठ पूजा की जाती है।<br>हमारे देश में सूर्य उपासना के कई प्रसिद्ध लोकपर्व हैं जो अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग रीति-रिवाजों के साथ मनाए जाते हैं। सूर्य षष्ठी के महत्व को देखते हुए इस पर्व को सूर्य छठ या डाला छठ के नाम से संबोधित किया जाता है। इस पर्व को बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और नेपाल की तराई समेत देश के उन तमाम महानगरों में मनाया जाता है। जहां-जहां इन प्रांतों के लोग निवास करते हैं। यही नहीं, मॉरिशस, त्रिनिडाड, सुमात्रा, जावा समेत विदेशों में भी भारतीय मूल के प्रवासी छठ पर्व को बड़ी आस्था और धूमधाम से मनाते हैं। डूबते सूर्य की विशेष पूजा ही छठ का पर्व है। चढ़ते सूरज को सभी प्रणाम करते हैं।<br>छठ पर्व की परम्परा में वैज्ञानिक और ज्योतिषीय महत्व भी छिपा हुआ है। षष्ठी तिथि एक विशेष खगोलीय अवसर है। जिस समय धरती के दक्षिणी गोलार्ध में सूर्य रहता है और दक्षिणायन के सूर्य की अल्ट्रावॉइलट किरणें धरती पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्रित हो जाती हैं। इन दूषित किरणों का सीधा प्रभाव जनसाधारण की आंखों, पेट, त्वचा आदि पर पड़ता है। इस पर्व के पालन से सूर्य प्रकाश की इन पराबैंगनी किरणों से जनसाधारण को हानि न पहुंचे। इस अभिप्राय से सूर्य पूजा का गूढ़ रहस्य छिपा हुआ है। इसके साथ ही घर-परिवार की सुख- समृद्धि और आरोग्यता से भी छठ पूजा का व्रत जुड़ा हुआ है। इस व्रत का मुख्य उद्देश्य पति, पत्नी, पुत्र, पौत्र सहित सभी परिजनों के लिए मंगल कामना से भी जुड़ा हुआ है।<br>छठ का पौराणिक महत्व अनादिकाल से बना हुआ है। रामायण काल में सीता ने गंगा तट पर छठ पूजा की थी। महाभारत काल में कुंती ने भी सरस्वती नदी के तट पर सूर्य पूजा की थी। इसके परिणाम स्वरूप उन्हें पांडवों जैसे पुत्रों का सुख मिला था। द्रौपदी ने भी हस्तिनापुर से निकलकर गढ़ गंगा में छठ पूजा की थी। छठ पूजा का सम्बंध हठयोग से भी है। जिसमें बिना भोजन ग्रहण किए हुए लगातार पानी में खड़ा रहना पड़ता है। जिससे शरीर के अशुद्ध जीवाणु परास्त हो जाते हैं।<br>लोक परम्परा के मुताबिक सूर्य देव और छठी मईया का संबंध भाई-बहन का है। इसलिए छठ के मौके पर सूर्य की आराधना फलदायी मानी गई। छठ पूजा अथवा छठ पर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है। छठ से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं और लोक गाथाओं पर गौर करें तो पता चलता है कि भारत के आदिकालीन सूर्यवंशी राजाओं का यह मुख्य पर्व था। छठ के साथ स्कंद पूजा की भी परम्परा जुड़ी है। भगवान शिव के तेज से उत्पन्न बालक स्कंद की छह कृतिकाओं ने स्तनपान करा रक्षा की थी। इसी कारण स्कंद के छह मुख हैं और उन्हें कार्तिकेय नाम से पुकारा जाने लगा। कार्तिक से संबंध होने के कारण षष्ठी देवी को स्कंद की पत्नी देवसेना नाम से भी पूजा जाने लगा।<br>एक मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। जिसकी शुरुआत सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्य की पूजा करके की थी। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे और वो रोज घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बने। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही परंपरा प्रचलित है। छठ पर्व के बारे मे एक कथा और भी है। इस कथा के मुताबिक जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए तब दौपदी ने छठ व्रत रखा था। इस व्रत से उनकी मनोकामना पूरी हुई थी और पांडवों को अपना राजपाट वापस मिल गया था।<br>महापर्व छठ हिंदू धर्म में एकमात्र ऐसा पर्व है जिसमें ना केवल उदयाचल सूर्य की पूजा की जाती है बल्कि अस्ताचलगामी सूर्य को भी पूजा जाता है। मान्यता है कि छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए भगवान सूर्य की अराधना की जाती है। पर्व का प्रारंभ नहाय-खाय से होता है, जिस दिन व्रती स्नान कर अरवा चावल, चना दाल और कद्दू की सब्जी का भोजन करते हैं। नहाय-खाय के दूसरे दिन यानी कार्तिक शुक्ल पक्ष पंचमी के दिनभर व्रती उपवास कर शाम में रोटी और गुड़ से बनी खीर का प्रसाद ग्रहण करते हैं। इस पूजा को खरना कहा जाता है। इसके अगले दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि को उपवास रखकर शाम को अस्ताचल गामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इसके अगले दिन यानी सप्तमी तिथि को सुबह उदीयमान सूर्य को अर्घ्य अर्पित करके व्रत तोड़ा जाता है।<br>छठ पूजा के व्रत को जो भी रखता है। वह इन दिनों में जल भी नही ग्रहण करता है। इस व्रत को करने से सुख-समृद्धि और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। इस पूजा वैसे तो मुख्य रुप से सू्र्य देवता की पूजा की जाती है। लेकिन साथ ही सूर्य देव की बहन छठ देवी की भी पूजा की जाती है। जिसके कारण इस पूजा का नाम छठ पूजा पड़ा। इस दिन नदी के तट में पहुंचकर पुरुष और महिलाएं पूजा-पाठ करते है। साथ ही छठ माता की पूजा को आपके संतान के लिए भी कल्याणकारी होती है।</p>



<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">दीदार ए हिन्द की रिपोर्ट</mark></strong></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>उदयपुर में फिल्म सिटी की स्थापना की केन्द्रीय मंत्री के समक्ष रखी मांग,..</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Deedare Hind]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 16 Sep 2023 14:47:42 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म]]></category>
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					<description><![CDATA[उदयपुर में फिल्म सिटी की स्थापना की केन्द्रीय मंत्री के समक्ष रखी मांग,.. उदयपुर, 16 सितंब। राजस्थान में झीलों की नगरी उदयपुर में फिल्म सिटी की स्थापना के लिए लाइन प्रोड्यूसर मुकेश माधवानी ने इस बार केन्द्र सरकार के समक्ष उदयपुर में फिल्म सिटी की मांग को पुरजोर ढंग से रखा है।श्री माधवानी ने शुक्रवार &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">उदयपुर में फिल्म सिटी की स्थापना की केन्द्रीय मंत्री के समक्ष रखी मांग,..</mark></strong></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-full"><img decoding="async" width="255" height="198" src="https://deedarehind.com/wp-content/uploads/2023/09/download-2023-09-16T201657.065.jpg" alt="" class="wp-image-61936" /></figure>
</div>


<p>उदयपुर, 16 सितंब। राजस्थान में झीलों की नगरी उदयपुर में फिल्म सिटी की स्थापना के लिए लाइन प्रोड्यूसर मुकेश माधवानी ने इस बार केन्द्र सरकार के समक्ष उदयपुर में फिल्म सिटी की मांग को पुरजोर ढंग से रखा है।<br>श्री माधवानी ने शुक्रवार को उदयपुर में पर्यटन विभाग के हितधारकों की परामर्श बैठक के दौरान अध्यक्षता कर रहे केन्द्रीय पर्यटन राज्य मंत्री अजय भट्ट के समक्ष यह मांग रखी।<br>श्री माधवानी ने अपनी मांग में मंत्री को अवगत करवाया कि उदयपुर में सिनेमा को लेकर बहुत संभावनाएं हैं, यहां हर साल कई फिल्मों, एड, म्यूजिक एल्बम आदि की शूटिंग होती है। ऐसे में अगर उदयपुर में फिल्म सिटी की स्थापना होती है तो यहां पर्यटन को बल मिलेगा। साथ ही क्षेत्रीय प्रतिभाओं को अपना हुनर दिखाने का मंच मिलेगा और रोजगार के भी द्वार खुलेंगे।</p>



<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">दीदार ए हिन्द की रिपोर्ट</mark></strong></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>वह चीज़े जिनका टूटनाअशुभ नहीं, शुभ माना जाता है..</title>
		<link>http://deedarehind.com/%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%9a%e0%a5%80%e0%a5%9b%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9f%e0%a5%82%e0%a4%9f%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%85%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%ad-%e0%a4%a8/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Deedare Hind]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 10 Nov 2022 09:51:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म]]></category>
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					<description><![CDATA[वह चीज़े जिनका टूटनाअशुभ नहीं, शुभ माना जाता है.. आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर कोई अपने काम जल्दबाजी में करता है। मगर अक्सर जल्दबाजी में किया गया आपका काम और भी बढ़ा देता है। जैसे कि रसोई में जल्दबाजी करते वक्त हाथ से कुछ गिर जाना या फिर खाना पकाते वक्त जल जाना, &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">वह चीज़े जिनका टूटनाअशुभ नहीं, शुभ माना जाता है..</mark></strong></p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img decoding="async" width="225" height="225" src="https://deedarehind.com/wp-content/uploads/2022/11/download-2022-11-10T152050.155.jpg" alt="" class="wp-image-41048" /></figure>



<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-cyan-blue-color">आज की भागदौड़ भरी </mark></strong>जिंदगी में हर कोई अपने काम जल्दबाजी में करता है। मगर अक्सर जल्दबाजी में किया गया आपका काम और भी बढ़ा देता है। जैसे कि रसोई में जल्दबाजी करते वक्त हाथ से कुछ गिर जाना या फिर खाना पकाते वक्त जल जाना, ऐसी कई बाते हैं जिन्हें लेकर न चाहते हुए भी लोगों के मन में वहम जाग जाता है। मगर वास्तु के अनुसार हाथ से किसी चीज का गिरना या फिर हाथ से गिरकर टूट जाना हर बार अशुभ नहीं माना जाता।</p>



<p>वास्तु के अनुसार चीजों का हाथ से गिरकर टूट जाना हमारे ऊपर या हमारी जिंदगी में अशुभ की बजाएं शुभ प्रभाव भी डालता हैं। अब इन चीजों में कितनी सच्चाई हैं, ये तो कोई नहीं जानता। फिर भी आज हम आपको कुछ चीज़ों के गिरने या टूटने पर होने वाले हमपर प्रभाव के बारे में बताएंगे जो इस प्रकार हैं…</p>



<p>दूध का उबलना &#8211; अक्सर लोग दूध के उबल कर गिर जाने पर चिंता करने लगते है और परेशान हो जाते हैं लेकिन इसके लिए एक धारणा है कि दूध अगर उबलकर सीधा जमीन पर गिरे तो उसे शुभ माना जाता है और अगर गैस की फ्लैम को छुएं तो वो अशुभ माना जाता है।</p>



<p>शीशे का टूटना &#8211; कांच टूटने पर लोग इसे अपशगुन समझने लगते है। वहीं वास्तु शास्त्र के अनुसार कांच का टूट कर गिरना शुभ माना जाता है। वास्तु शास्त्र के मुताबिक कांच आप पर आने वाली बला को खुद पर लेकर टूट जाता है लेकिन याद रखें कि टूटे हुए कांच को जितना जल्दी हो सके बाहर फेंक दे क्योंकि ऐसा करने से कांच के साथ-साथ आप पर आने वाली बला भी कांच के साथ ही घर से बाहर चली जाएगी।</p>



<p>नमक का गिरना &#8211; नमक खाना बनाने के साथ-साथ नज़र उतारने के भी काम आता है लेकिन किसी कारणवश यह हाथों से गिर जाएं तो इसे अपशगुन माना जाता है मगर इंग्लैंड में लोकविश्वास है कि गिरे नमक में से एक चुटकी लेकर बाएं कंधे की ओर से पीछे फेंक देने पर अपशगुन नहीं होता।</p>



<p>चप्पल का टूटना &#8211; अगर आपकी चप्पल बहुत पुरानी या आम भाषा में कहें कि घिस कर टूट गई है तो इसे शुभ माना जाता है। लोगों की इस बारे में सोच है कि चप्पल के घिसकर टूटने से उनके दुख भी टूट कर नष्ट हो जाते हैं।</p>



<p>हाथ से चीज़ों का गिरना &#8211; अगर हाथों और पर्स से रूपए-पैसे गिर जाते है तो इसे अशुभ और धन की देवी लक्ष्मी का रुठ जाना मानते हैं। ये आर्थिक नुकसान का संकेत देता है। इससे बचने के लिए गिरे हुए रूपए-पैसों को तुरंत उठाकर सिर से लगाकर धन की देवी लक्ष्मी से क्षमा याचना करके उसे जेब में रखना चाहिए। इससे आर्थिक नुकसान से बचाव होगा।</p>



<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">दीदार ए हिन्द की रिपोर्ट</mark></strong></p>
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			</item>
		<item>
		<title>अन्तर्जगत की यात्रा का विज्ञान है ध्यान&#8230;</title>
		<link>http://deedarehind.com/%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a4%97%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b5%e0%a4%bf/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Deedare Hind]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 28 Oct 2022 08:18:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म]]></category>
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					<description><![CDATA[अन्तर्जगत की यात्रा का विज्ञान है ध्यान&#8230; यदि जीवन में तनाव, चिंता, निराशा, लोभ, अहंकार, अवसाद, घृणा और द्वेष आदि बढ़ रहे हैं तो आवश्यकता है ध्यान की। ध्यान हमारे जीवन का अत्यावश्यक अंग है। ध्यान ही साधना है, जो हमें न केवल संसार में जीने की कला सिखाता है वरन् ईश्वर प्राप्ति का प्रमुख &#8230;]]></description>
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<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-cyan-blue-color">अन्तर्जगत की यात्रा का विज्ञान है ध्यान&#8230;</mark></strong></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="225" height="225" src="https://deedarehind.com/wp-content/uploads/2022/10/download-2022-10-28T134753.026.jpg" alt="" class="wp-image-39940" /></figure>
</div>


<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">यदि जीवन में तनाव,</mark></strong> चिंता, निराशा, लोभ, अहंकार, अवसाद, घृणा और द्वेष आदि बढ़ रहे हैं तो आवश्यकता है ध्यान की। ध्यान हमारे जीवन का अत्यावश्यक अंग है। ध्यान ही साधना है, जो हमें न केवल संसार में जीने की कला सिखाता है वरन् ईश्वर प्राप्ति का प्रमुख साधन है। ध्यान समाधान है प्रत्येक उस समस्या का जो हमें असफलता निराशा, तनाव और अवसाद में धकेल कर बर्बाद करना चाहते हैं। ध्यान एक सुकून है, शांति है जो हमें बाह्य किसी भी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति से प्राप्त नहीं हो सकते। ध्यान हमें धैर्यपूर्वक जीवन जीने की कला सिखाता है। कुछ लोग ध्यान को सांसारिक सुख की आशा से जोड़ लेते हैं, और जब उन्हें वह सुख नहीं मिलता तो वे ध्यान का विरोध करते हैं और कहते हैं ध्यान से कुछ नहीं होता। कुछ लोग सोचते हैं कि जीवन में सब ठीक ठाक चल रहा है, फिर ध्यान की क्या जरूरत है, किन्तु जब समस्या आती है और उन्हें कोई उपाय नहीं सूझता तो बेमन से, अश्रध्दापूर्वक ध्यान को ट्रायल के रूप में स्वीकार करते हैं और फिर मनचाहा समाधान न मिलने पर ध्यान के खिलाफ हो जाते हैं।</p>



<p>कोई कहता है कि ध्यान लगता तो नहीं है नहीं, फिर बेठने से भी क्या लाभ? समय का विनाश ही होता है। उन्होंने ध्यान के सिध्दांत को, मन के विज्ञान को समझा ही नहीं है और एक प्रक्रिया के रूप में ध्यान को केवल अजमाना चाहते हैं और शीघ्र ही निराश होकर ध्यान के विपक्षी हो जाते हैं। कोई कहता है, कौन सी विधि सर्वश्रेष्ठ है, यही निश्चित करना बड़ा कठिन है। कोई कहता है आंख खोलकर ध्यान करो तो दूसरा कहता है आंख बंद करके। कोई कहता है मन को केंद्रित करो तो कोई कहता है मन को स्वतंत्र छोड़ दो। लेटकर ध्यान करें या बैठकर। ध्यान की मुद्रा क्या हो अथवा किस आसन में ध्यान करें। इतने प्रश्नों के जंजाल में फंसा व्यक्ति अंत में यही निर्णय लेता है कि छोड़ो ध्यान के लिये समय ही नहीं है।</p>



<p>सत्यता यह है कि ध्यान एक विज्ञान है जिसे समझकर साधक सांसारिक जगत से सिमटकर अपने अन्तर्जगत की यात्रा प्रारंभ करता है। करो-करो के श्रम से हटकर कुछ न करो में प्रवेश करता है और तब उसे अनुभव होता है कि अंदर भी एक जगत है तो बाह्य जगत से अधिक खूबसूरत, विशाल और शांति को देने वाला है, जहां पहुंचकर साधक के सारे प्रश्नों का अंत हो जाता है, प्रक्रियाएं धराशायी होकर आत्मसुख के मीठे महासागर में डुबकी लगाता है। ध्यान चाहे किसी भी विधि से किया जाए, महत्व इस बात का है कि ध्यानकर्ता के जीवन में क्या परिवर्तन आ रहा है। ध्यान करने वाला साधक स्वयं ही एकांत में बैठकर अपने आप पर नजर डाले और खोज करे कि क्या वह इंसान है जो ध्यान से पहले था, या उसमें कुछ बदलाव आ रहा है।</p>



<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-cyan-blue-color">दीदार ए हिन्द की रिपोर्ट</mark></strong></p>
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		<item>
		<title>मंदिरों व इतिहास की नगरी का करें दर्शन..</title>
		<link>http://deedarehind.com/%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%b5-%e0%a4%87%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%95/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Deedare Hind]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 24 Oct 2022 08:57:23 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म]]></category>
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					<description><![CDATA[मंदिरों व इतिहास की नगरी का करें दर्शन.. भुवनेश्वर बाहर से नया है किंतु भीतर से यह पनचीन नगरी है। भारत में शायद ही अन्य ऐसा कोई नगर हो जहां विभिन्न कालखंडों में बने इतने स्मारक देखने को मिलते हों। यदि संजीदगी से देखें यहां के कोने-कोने में मौजूद मंदिरों, गुफाओं व शिलालेखों के रूप &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">मंदिरों व इतिहास की नगरी का करें दर्शन..</mark></strong></p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="259" height="194" src="https://deedarehind.com/wp-content/uploads/2022/10/download-2022-10-24T142648.017.jpg" alt="" class="wp-image-39383" /></figure>



<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">भुवनेश्वर बाहर से नया है </mark></strong>किंतु भीतर से यह पनचीन नगरी है। भारत में शायद ही अन्य ऐसा कोई नगर हो जहां विभिन्न कालखंडों में बने इतने स्मारक देखने को मिलते हों। यदि संजीदगी से देखें यहां के कोने-कोने में मौजूद मंदिरों, गुफाओं व शिलालेखों के रूप में इतिहास बिखरा पडा है। पश्चिम में धौली पहाडी के आधार पर सवा दो हजार साल पुराने अशोक कालीन शिलालेख व चिन्ह मौजूद हैं तो शहर के पूर्वी भाग में खंडगिरी व उदयगिरी की पहाडियों में 2 हजार साल पहले बनी जैन सन्यासियों की गुफाएं। इसी नगर के पुराने हिस्से में 700 से 1300 साल पूर्व बने अनेकानेक मंदिर है। पनचीन व मध्यकालीन इन संरचनाओं के अलावा भुवनेश्वर में नन्दनकानन पनणी उद्यान, शान्ति स्तूप, रवींदन् मण्डप, साइन्स सेन्टर, राज्य संगन्हालय आकर्षण के रूप में उभरे हैं।</p>



<p>भुवनेश्वर भी कभी एक पन्सिद्ध मन्दिर नगरी थी। कहा जाता है कि एक समय यहां 7000 मन्दिर थे लेकिन समय की मार, आक्रांताओं के हमलों, उपेक्षा व उचित रखरखाव के अभाव में एक के बाद एक मंदिर जमींदोज होते चले गए। भुवनेश्वर में उस काल के अवशेष मंदिर उडीसा ही नहीं बल्कि भारत की उत्तर मध्य व मध्यकालीन शिल्पकला व स्थापत्य कौशल का दिग्दर्शन कराते हैं।</p>



<p>कलिंग की इस धरती ने सत्ता संघर्ष की पराकाष्ठा को बेहद निकट से देखा है। पहली शती से सातवीं शती के मध्य कलिंग के इतिहास का बहुत धुंधला सा है। लेकिन अलग-अलग दौर में अनेक शासकों का यहां राज रहा। ईसा पूर्व पहली शती में कलिंग में छेदी सामनज्य का उद्भव हुआ जो जैन धर्म के अनुयायी थे। इस काल के तीसरे नरेश खरवीला का शासन उल्लेखनीय है जिस दौरान यहां खंडगिरी व उदयगिरी की पहाडियों में बनी जैन सन्यासियों की गुफाएं बननी आरंभ हुई। दूसरी शती में यहां पर सातवाहन राजाओं के शासन का उल्लेख मिलता है। तीसरी शती में कुषण व नागवंशियों ने भी कलिंग के कुछ हिस्से पर शासन किया। उसके उपरांत समुदन्गुप्त ने इस राज्य को अपने अधीन किया। चैथी शती के अन्त तक यहां मराठा शासन रहा। जिनके बाद पांचवीं शती में यहां पर पूर्वी गंग नरेशों का काल आया। लेकिन फिर समनट हर्षवर्द्धन ने इसे विजित किया। उनके बाद फिर बौद्ध धर्म के अनुयायी राजा भूमा रहे।</p>



<p>इसके उपरांत कलिंग पर हिंदू राजाओं का पूरी तरह से अधिपत्य हुआ। आठवीं शती में हिंदू धर्म के पुनर्जागरण के बाद हर नरेश अपनी क्षमता व राज्य के संसाधनों से मंदिरों का निर्माण करवाता चला गया। आरंभ में एकामन्तीर्थ यानि भुवनेश्वर इसका केंदन् था। दसवीं शती के उत्तरार्द्ध में कलिंग की धरती पर सोमवंशी राजवंश का उदय हुआ जिसके राजाओं ने 11वीं शती तक यहां अलग-अलग काल में राज किया। इस काल में भुवनेश्वर सत्ता का केन्दन् रहा और उनके काल में ही पुरी स्थित जगन्नाथ मन्दिर की आधारशिला रखी गई। हालांकि इसका निर्माण गंग नरेश अनंग भीमदेव द्वितीय के काल जाकर पूर्ण हुआ। पुरी के मंदिर परिसर में मंदिरों को विभिन्न राजाओं ने बनवाया। 11वीं शती में हुए ललातेन्दु केसरी ने भुवनेश्वर के लिंगराज मंदिर की आधारशिला रखी। 12वीं शती में फिर से कलिंग में गंग सामनज्य स्थापित हुआ जिन्होंने कलिंग में सोमवंशी सत्ता को उखाड फेंका। राजा नरसिंह देव इस वंश के राजा थे जिन्होंने कोणार्क में सूर्य मंदिर को बनवाया।</p>



<p>पनचीन, उत्तर-मध्य और मध्यकालीन दौर में भुवनेश्वर में जो भी मंदिर निर्मित हुए उनकी कलात्मक, सुन्दरता व भव्यता किसी को मन्त्रमुग्ध करने को पर्याप्त है। इन पर लगा पन्त्येक पत्थर ऐसे लगा है मानो वह कुछ न कुछ बोल रहा हो। पुराने शहर में कई अन्य मन्दिर भी हैं जो पुराने हिस्से में बनी आवासीय कालोनियों के मध्य देखे जा सकते हैं। 7वीं शती से लेकर 13वीं शती का काल उडीसा में स्थापत्य व शिल्पकला का चरम काल माना जाता है। भुवनेश्वर के मंदिरों में वैसे तो रामेश्वर, लक्ष्मणेश्वर, भरतेश्वर, शत्रुघ्नेश्वर, केदारेश्वर, सिद्धेश्वर, अनन्त वासुदेव, परशुरामेश्वर, मुक्तेश्वर, राजा-रानी, लिंगराज आदि हैं, किन्तु इनमें से अंतिम चार मन्दिर उल्लेखनीय हैं। इनमें से लिंगराज मन्दिर को छोड अन्य में आज पूजा-अर्चना नहीं होती है। ये मंदिर विभिन्न समयावधि में निर्मित हुए व अलग-अलग शैलियों के है। इनमें परशुरामेश्वर मन्दिर सबसे पनचीन मन्दिर समझा जाता है। इसका निर्माण 650 ई. में हुआ माना जाता है। यद्यपि इस मंदिर का 1903 में जीर्णाद्धार किया गया किन्तु मन्दिर का गर्भगृह मूल रूप में हैं। 950 ई. में निर्मित मुक्तेश्वर मन्दिर मध्यकालीन भव्य मन्दिरों का लघु रूप है। राजा-रानी मंदिर सुनने से लगता है कि इसका संबंध राजा-रानी से होगा किंतु ऐसा नहीं है। संभवतः इस मंदिर में लगे दो पन्कार के पत्थरों, जिनमें से एक लाल व दूसरा का नाम राजरणियां था, के कारण इसका लोकपिन्य नाम राजा-रानी हो गया। मंदिर का शिल्प दर्शनीय है।</p>



<p>उडीसा के चाहे आप जितने भी मन्दिर देख लें लेकिन यदि भुवनेश्वर का लिंगराज मन्दिर न देख पाएं तो कहा यहीं जाएगा कि भला आपने क्या देखा? लिंगराज मन्दिर एक विशाल मन्दिर होने के साथ स्थापत्य, शिल्प में अद्वितीय मन्दिर है। वस्तुतः यह आधा शिव व आधा विणु मन्दिर माना जाता है इसीलिए इसमें बेलपत्र व तुलसी के साथ पूजा होती हैं। मन्दिर परिसर के चारों ओर पत्थरों की ऊँची दीवार है। पहली बार देखने पर हर कोई इसकी भव्यता से दंग रह जाता है। इस पर जितनी बारीकी से काम हुआ है वैसी आज कल्पना ही की जा सकती है। मन्दिर के बाहर कई देवों की मूर्तियां बनी हैं। मंदिर परिसर में ही लगभग छोटे-बडे 150 अन्य मंदिर हैं।</p>



<p>इन मन्दिरों के अलावा भुवनेश्वर में रामेश्वर, अनन्त वासुदेव मन्दिरों को भी देखा जा सकता है। यहां से 16 किमी दूर हीरापुर में 64 योगिनी मंदिर भी देखने लायक है। भुवनेश्वर में खंडगिरी-उदयगिरी की पहाडियों पर जैन सन्यासियों की गुफाएं दर्शनीय हैं। ये गुफाएं चट्टानों को खोदकर बनाई गई हैं। इनमें से उदयगिरी में 18 गुफाएं है जबकि खण्डागिरी में 15 छोटी-बडी गुफाओं के अलावा जैन मन्दिर है। उदयगिरी की गुफाओं में हाथीगुफा व रानीगुफा उल्लेखनीय हैं। भुवनेश्वर-पुरी मार्ग पर धौलीगिरी में कुछ बहुत नया है तो कुछ बहुत पनचीन। इस पहाडी के एक ओर दया नदी है जिसके किनारे कलिंग व मगध की सेनाओं के बीच भंयकर युद्ध हुआ था। पहाडी के आधार पर अशोककालीन आदेश आज भी देखे जा सकते हैं। इसके समीप पत्थरों पर तराशा गया हाथी का मुख है जो इंगित करता है कि अशोक के काल में शिल्प कला कितनी उन्नत रही होगी। पहाडी पर एक विशाल विश्व शान्ति स्तूप है। इसका निर्माण 1973 में किया गया था। स्तूप के चारों ओर अलग-अलग मुदन में बुद्ध की चार मूर्तिया हैं। स्तूप में जातक कथाओं से संबंधित पन्संग पत्थरों पर उकेरे हैं। भुवनेश्वर में पर्यटन अभिरुचि के अन्य स्थानों में नन्दनकानन पनणी उद्यान भी जो शहर से 20 किमी की दूरी पर है। यह चिडियाघर एक विशाल क्षेत्रफल में है जो पनकतिक रूप से यहां के जानवरों के लिए पन्सिद्ध है। यह उद्यान सफेद बाघों के लिए भी पन्सिद्ध है। इसके अतिरिक्त यहां पर कई अन्य वन्य जन्तुओं भी देखा जा सकता है। भुवनेश्वर का राज्य संगन्हालय भी दर्शनीय है। भुवनेश्वर देश के हर भाग से सीधी रेल सेवा व विमान सेवा से जुडा है। राजधानी है होने से हर पन्कार की आधुनिक सुविधाएं यहां मौजूद हैं। हरेक पन्कार के पर्यटक के लिए यहां पर सुविधाएं हैं। नगर की सैर के लिए उडीसा पर्यटन विकास कॉरपोरेशन पैकेज टूर चलाता है। इसमें आप शहर के खास-खास स्थान देख सकते हैं। आप चाहें तो अलग से भी योजना बना कर घूम सकते हैं।</p>



<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-cyan-blue-color">दीदार ए हिन्द रिपोर्ट</mark></strong></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>आकांक्षारहित हो प्रार्थना..</title>
		<link>http://deedarehind.com/%e0%a4%86%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%b9%e0%a5%8b-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%a8/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Deedare Hind]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 24 Oct 2022 08:47:47 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म]]></category>
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					<description><![CDATA[आकांक्षारहित हो प्रार्थना.. पहली बात, परिणाम की जब तक आकांक्षा है, तब तक प्रार्थना पूरी न होगी। या यूं कहो-परिणाम की जब तक आकांक्षा है, परिणाम न आएगा। प्रार्थना तो शुद्ध होनी चाहिए, परिणाम से मुक्त होनी चाहिए, फलाकांक्षा से शून्य होनी चाहिए। कम से कम प्रार्थना तो फलाकांक्षा से शून्य करो। कृष्ण तो कहते &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-cyan-blue-color">आकांक्षारहित हो प्रार्थना..</mark></strong></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="290" height="174" src="https://deedarehind.com/wp-content/uploads/2022/10/download-2022-10-24T141655.481.jpg" alt="" class="wp-image-39368" /></figure>
</div>


<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">पहली बात, परिणाम की जब तक आकांक्षा है,</mark></strong> तब तक प्रार्थना पूरी न होगी। या यूं कहो-परिणाम की जब तक आकांक्षा है, परिणाम न आएगा। प्रार्थना तो शुद्ध होनी चाहिए, परिणाम से मुक्त होनी चाहिए, फलाकांक्षा से शून्य होनी चाहिए। कम से कम प्रार्थना तो फलाकांक्षा से शून्य करो। कृष्ण तो कहते हैं कि दुकान भी फलाकांक्षा से शून्य होकर करो। युद्ध भी फलाकांक्षा से शून्य होकर लड़ो। तुम कम से कम इतना तो करो कि प्रार्थना फलाकांक्षा से मुक्त कर लो। उस पर तो पत्थर न रखो फलाकांक्षा के।</p>



<p>फलाकांक्षा के पत्थर रख दोगे, प्रार्थना का पक्षी न उड़ पाएगा। तुमने शिला बांध दी पक्षी के गले में। अब तुम पूछते हो-प्रार्थनाएं परिणाम न लाएं तो क्या करें? प्रार्थनाएं जरूर परिणाम लाती हैं मगर तभी जब परिणाम की कोई आकांक्षा नहीं होती। यह विरोधाभास तुम्हें समझाना ही होगा। यह धर्म की अंतरंग घटना है। यह उसका राजों का राज है। जिसने मांगा, वह खाली रह गयाय और जिसने नहीं मांगा, वह भर गया। तुम्हारी तकलीफ समझता हूं, क्योंकि प्रार्थना हमें सिखाई ही गई है मांगने के लिए। जब मांगना होता है कुछ, तभी लोग प्रार्थना करते हैं, नहीं तो कौन प्रार्थना करता है?</p>



<p>लोग दुख में याद करते हैं परमात्मा को, सुख में कौन याद करता है? मगर सुख में याद करने का मतलब यही होता है कि अब कोई आकांक्षा नहीं होगी। सुख तो है ही, अब मांगना क्या है? जब सुख में कोई प्रार्थना करता है तो प्रार्थना केवल धन्यवाद होती है। जब दुख में कोई प्रार्थना करता है तो प्रार्थना में भिखमंगापन होता है। सम्राट से मिलने चले हो भिखारी होकर, दरवाजों से ही लौटा दिए जाओगे। पहरेदार भीतर प्रवेश न होने देंगे। सम्राट से मिलने चले हो, सम्राट की तरह चलो।</p>



<p>सम्राट की चाल क्या है? न कोई वासना है, न आकांक्षा हैय जीवन का आनंद है और आनंद के लिए धन्यवाद है। जो दिया है, वह इतना है। मांगना है क्या और? बिना मांगे इतना दिया है। एक गहन तज्ञता का भाव-वहीं प्रार्थना है। मगर तुम्हारी अड़चन मैं समझा। बहुतों की अड़चन यही है। प्रार्थना पूरी नहीं होती तो शक होने लगता है परमात्मा पर। मजा है कैसा।</p>



<p>प्रार्थना पर शक नहीं होता-कि मेरी प्रार्थना में कोई गलती तो नहीं हो रही? परमात्मा पर शक होने लगता है। मेरे पास लोग आकर कहते हैं कि प्रार्थना तो पूरी होती ही नहीं है हमारी, जनम-जनम हो गए! तो परमात्मा है भी या नहीं? परमात्मा पर शक होता है। मजा देखना! अपने पर शक नहीं होता-कि मेरी प्रार्थना में कहीं कोई भूल तो नहीं? नाव ठीक नहीं चलती तो मेरी पतवारें गलत तो नहीं हैं? दूसरा किनारा है या नहीं, इस पर शक होने लगता है।</p>



<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-cyan-blue-color">दीदार ए हिन्द रिपोर्ट</mark></strong></p>



<p></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>नवरात्रि के व्रतों में आपका मीठा खाने का मन है तो बनाएं कच्चे पपीते का हलवा..</title>
		<link>http://deedarehind.com/%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%86%e0%a4%aa/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Deedare Hind]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 17 Oct 2022 09:37:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म]]></category>
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					<description><![CDATA[नवरात्रि के व्रतों में आपका मीठा खाने का मन है तो बनाएं कच्चे पपीते का हलवा.. शारदीय नवरात्रि के दिनों में व्रती भक्तों को जिस चीज को लेकर सबसे ज्यादा परेशानी होती है, वह है कि हर दिन नया क्या बनाया जाए। चूंकि व्रत रखते समय आपको खानपान पर संयम बरतना होता है और कुछ &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-cyan-blue-color">नवरात्रि के व्रतों में आपका मीठा खाने का मन है तो बनाएं कच्चे पपीते का हलवा..</mark></strong></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="293" height="172" src="https://deedarehind.com/wp-content/uploads/2022/10/download-2022-10-17T150722.830.jpg" alt="" class="wp-image-39037" /></figure>
</div>


<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">शारदीय नवरात्रि के दिनों </mark></strong>में व्रती भक्तों को जिस चीज को लेकर सबसे ज्यादा परेशानी होती है, वह है कि हर दिन नया क्या बनाया जाए। चूंकि व्रत रखते समय आपको खानपान पर संयम बरतना होता है और कुछ खास चीजों का ही सेवन करना होता है। ऐसे में कुछ नया खाने का मन करता है तो समझ नहीं आता कि क्या खाएं। अगर आप भी इस नवरात्रि कुछ हेल्दी व टेस्टी खाना चाहते हैं तो कच्चे पपीते का हलवा बनाएं। तो चलिए जानते हैं इसे बनाने का तरीका…</p>



<p>सामग्री…</p>



<p>तीन कप कच्चा पपीता कद्दूकस किया हुआ</p>



<p>येलो फूड कलर आप्शनल</p>



<p>पिस्ता व बादाम गार्निशिंग के लिए</p>



<p>आधा कप खोया</p>



<p>चीनी एक कप</p>



<p>दो टेबलस्पून घी</p>



<p>विधि…</p>



<p>पपीते का हलवा बनाने के लिए पहले आप पैन में घी डालकर गर्म करें। जब यह गर्म हो जाए तो मीडियम फ्लेम पर इसमें कद्दूकस किया हुआ पपीता डालकर करीबन दस मिनट के लिए चलाते हुए पकाएं। जब पपीता थोड़ा साफ्ट हो जाए तो इसमें चीनी व खोया डालकर मिलाएं। आप चाहें तो इस समय इलायची पाउडर या केवड़ा एसेंस भी मिला सकते हैं। यह पूरी तरह आपके टेस्ट पर निर्भर है।</p>



<p>जब चीनी मेल्ट होने लगे तो इसमें फूड कलर मिलाएं। यह भी पूरी तरह ऑप्शनल है। अगर आप चाहें तो इसे स्किप भी कर सकते हैं। कुछ देर में आपका हलवा बनकर तैयार हो जाएगा। इसके बाद गैस को बंद करें और इसमें बारीक कटे बादाम, काजू और पिस्ता डालें। आपका टेस्टी कच्चे पपीते का हलवा बनकर तैयार है। आप इस रेसिपी को आसानी से नवरात्रि में बना सकते हैं और खा सकते हैं।</p>



<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-cyan-blue-color">दीदार ए हिन्द की रिपोर्ट</mark></strong></p>
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		<item>
		<title>इस नवरात्रि चाहिए मां की विशेष कृपा तो जरूर अपनाएं यह वास्तु टिप्स..</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Deedare Hind]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 17 Oct 2022 09:36:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म]]></category>
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					<description><![CDATA[इस नवरात्रि चाहिए मां की विशेष कृपा तो जरूर अपनाएं यह वास्तु टिप्स.. वैसे तो मां को अपना बच्चा बेहद प्यारा होता है और वह उसका हमेशा ध्यान रखती हैं। लेकिन फिर भी मां से विशेष प्रेम और स्नेह पाने के लिए बच्चों को कुछ अतिरिक्त प्रयास करने होते हैं। ऐसा ही एक पर्व है &#8230;]]></description>
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<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-cyan-blue-color">इस नवरात्रि चाहिए मां की विशेष कृपा तो जरूर अपनाएं यह वास्तु टिप्स..</mark></strong></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="293" height="172" src="https://deedarehind.com/wp-content/uploads/2022/10/download-2022-10-17T150550.924.jpg" alt="" class="wp-image-39034" /></figure>
</div>


<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">वैसे तो मां को अपना बच्चा बेहद प्यारा होता है </mark></strong>और वह उसका हमेशा ध्यान रखती हैं। लेकिन फिर भी मां से विशेष प्रेम और स्नेह पाने के लिए बच्चों को कुछ अतिरिक्त प्रयास करने होते हैं। ऐसा ही एक पर्व है नवरात्रि। जब माता की भक्ति करके हर कोई उनकी विशेष कृपा पाने की आस रखता है। हालांकि ऐसा करना कठिन नहीं है। अगर आप कुछ छोटे…छोटे उपाय अपनाते हैं तो मां की विशेष कृपा के पात्र बनते हैं। आज हम आपको कुछ ऐसे ही वास्तु उपायों के बारे में बता रहे हैं, जिन्हें नवरात्रि में अपनाकर आप मां की भक्ति का विशेष लाभ उठा सकते हैं…</p>



<p>जरूर करें सफाई</p>



<p>वास्तु शास्त्री डॉ. आनंद भारद्वाज बताते हैं कि नवरात्रि में माता की पूजा करने से पहले पूजा स्थान की सफाई करना बेहद आवश्यक है। आप मंदिर के परदों व कपड़े की साफ…सफाई के साथ मूर्तियों को भी अवश्य साफ करें। इसके अलावा कई बार धूप…अगरबत्ती जलने के बाद वहीं गिर जाती है तो उसे भी साफ करें। वहीं अगर धूप…अगरबत्ती के कारण मंदिर का कपड़ा या परदा आदि हल्का सा जल गया है या उसमें निशान हो गया है तो उसे तुरंत बदल दें।</p>



<p>बदल दें मूर्ति</p>



<p>वास्तु शास्त्री डॉ. आनंद भारद्वाज के अनुसार, पिछली नवरात्रि के बाद अगर माता की या फिर मंदिर में रखी कोई मूर्ति खंडित हो गई है तो यह बेहद जरूरी है कि आप उसे अवश्य बदल दें। भले ही मूर्ति में हल्का क्रैक हो, लेकिन खंडित मूर्ति की पूजा नहीं करना चाहिए। आप चाहें तो चांदी की मूर्ति भी इस्तेमाल कर सकते हैं।</p>



<p>मूर्ति की ऊंचाई</p>



<p>वास्तु शास्त्री डॉ. आनंद भारद्वाज कहते हैं कि अगर आप इस नवरात्रि माता की नई मूर्ति खरीद रहे हैं तो ध्यान रखें कि उसकी ऊंचाई नौ इंच से अधिक ना हो। हालांकि ऊंचाई नापते समय माता का छत्र या आसन जैसे शेर आदि को नहीं नापा जाता। सिर्फ माता की मूर्ति की ऊंचाई नौ इंच होनी चाहिए। वहीं अगर आप फोटो लगा रहे हैं तो उसके लिए ऊंचाई का कोई नियम नहीं है।</p>



<p>लाल रंग का हो इस्तेमाल</p>



<p>वास्तु शास्त्री डॉ. आनंद भारद्वाज कहते हैं कि अगर आप नवरात्रि के दिनों में माता की विशेष कृपा पाना चाहते हैं तो लाल रंग का अधिक से अधिक इस्तेमाल करें। इसके अलावा आप गोल्डन या कीमती धातु के कलर का भी इस्तेमाल कर सकती हैं। जैसे माता के लाल कपड़े या फिर गोटा वाले कपड़े का इस्तेमाल करें। इसके अलावा माता की पूजा के दौरान पीले व लाल रंग के फल व फूल का इस्तेमाल अधिक से अधिक करें।</p>



<p>ओम् या स्वास्तिक बनाएं</p>



<p>माता की विशेष कृपा पाने के लिए आप नवरात्रि की शुरूआत में अपने घर के मुख्य द्वार पर ओम् या स्वास्तिक का चिन्ह बनाएं। यह आपके घर में सकारात्मकता का संचार करता है। इसके अलावा आजकल ऐसे बन्दनवार मिलते हैं, जिनमें माता की तस्वीर होती है, आप उन्हें भी अपने घर के मुख्य द्वार पर लगा सकते हैं। वहीं अगर आपके मुख्य द्वार पर इतनी जगह नहीं है तो आप मंदिर के दरवाजे पर इस बन्दनवार को लगाएं।</p>



<p>जरूर करें इस मंत्र का उच्चारण</p>



<p>अगर आप नवरात्रि के दिनों में माता की विशेष कृपा पाना चाहते हैं तो आपको पूजा के दौरान या फिर घर में ऐसे भी नवार्ण मंत्र का उच्चारण अवश्य करें। यह नवार्ण मंत्र है… ओम् ऐं हृीं क्लीं चामुंडायै विच्चे। यह माता का बीज मंत्र या महामंत्र है और इसका उच्चारण करने से माता बेहद प्रसन्न होती है और इच्छापूर्ति करती हैं।</p>



<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-cyan-blue-color">दीदार ए हिन्द की रिपोर्ट</mark></strong></p>
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			</item>
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		<title>मंदिरों का शहर हम्पी..</title>
		<link>http://deedarehind.com/%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b6%e0%a4%b9%e0%a4%b0-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a5%80-2/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Deedare Hind]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 15 Oct 2022 10:36:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म]]></category>
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					<description><![CDATA[मंदिरों का शहर हम्पी.. यूनेस्को की विश्व विरासत की सूची में शामिल हम्पी भारत का एक प्रमुख पर्यटन स्थल है। 2002 में भारत सरकार ने इसे प्रमुख पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित करने की घोषणा की थी। हम्पी में स्थित दर्शनीय स्थलों में सम्मिलित हैं-विरूपाक्ष मन्दिर, रघुनाथ मन्दिर, नरसिम्हा मन्दिर, सुग्रीव गुफा, विठाला मन्दिर, &#8230;]]></description>
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<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-red-color">मंदिरों का शहर हम्पी..</mark></strong></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="304" height="166" src="https://deedarehind.com/wp-content/uploads/2022/10/download-2022-10-15T160540.823.jpg" alt="" class="wp-image-38719" /></figure>
</div>


<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-cyan-blue-color">यूनेस्को की विश्व विरासत</mark></strong> की सूची में शामिल हम्पी भारत का एक प्रमुख पर्यटन स्थल है। 2002 में भारत सरकार ने इसे प्रमुख पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित करने की घोषणा की थी। हम्पी में स्थित दर्शनीय स्थलों में सम्मिलित हैं-विरूपाक्ष मन्दिर, रघुनाथ मन्दिर, नरसिम्हा मन्दिर, सुग्रीव गुफा, विठाला मन्दिर, कृष्ण मन्दिर, हजारा राम मन्दिर, कमल महल तथा महानवमी डिब्बा आदि। हम्पी से 6 किलोमीटर दूर तुंगभद्रा बांध स्थित है। कहा जाता है कि हम्पी के हर पत्थर में कहानी बसी है। यहां दो पत्थर त्रिकोण आकार में जुड़े हुए हैं। दोनों देखने में एक जैसे ही हैं, इसलिए इन्हें सिस्टर स्टोंस कहा जाता है। इसके पीछे भी एक कहानी प्रचलित है। दो ईष्र्यालु बहनें हम्पी घूमने आईं, वे हम्पी की बुराई करने लगीं। शहर की देवी ने जब यह सुना तो उन दोनों बहनों को पत्थर में तब्दील कर दिया।</p>



<p>स्थापत्य कला<br>विजयनगर के शासकों ने मंत्रणागृहों, सार्वजनिक कार्यालयों, सिंचाई के साधनों, देवालयों तथा प्रासादों के निर्माण में बहुत उत्साह दिखाया। विदेशी यात्री नूनीज ने नगर के अन्दर सिंचाई की अद्भुत व्यवस्था और विशाल जलाशयों का वर्णन किया है। राजकीय परकोटे के अंतर्गत अनेक प्रासाद, भवन एवं उद्यान बनाये गये थे। राजकीय परिवार की स्त्रियों के लिए अनेक सुन्दर भवन थे, जिनमें कमल-प्रासाद सुन्दरतम था। यह भारतीय वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण था। यह माना जाता है कि एक समय में हम्पी रोम से भी समृद्ध नगर था। प्रसिद्ध मध्यकालीन विजयनगर राज्य के खण्डहर वर्तमान हम्पी में मौजूद हैं। इस साम्राज्य की राजधानी के खण्डहर संसार को यह घोषित करते हैं कि इसके गौरव के दिनों में स्वदेशी कलाकारों ने यहां वास्तुकला, चित्रकला एवं मूर्तिकला की एक पृथक शैली का विकास किया था। हम्पी पत्थरों से घिरा शहर है। यहां मंदिरों की खूबसूरत शृंखला है, इसलिए इसे मंदिरों का शहर भी कहा जाता है।</p>



<p>मंदिरों का शहर<br>हम्पी मंदिरों का शहर है जिसका नाम पम्पा से लिया गया है। पम्पा तुंगभद्रा नदी का पुराना नाम है। हम्पी इसी नदी के किनारे बसा हुआ है। पौराणिक ग्रंथ रामायण में भी हम्पी का उल्लेख वानर राज्य किष्किन्धा की राजधानी के तौर पर किया गया है। शायद यही वजह है कि यहां कई बंदर हैं। हम्पी से पहले एनेगुंदी विजयनगर की राजधानी हुआ करती थी। दरअसल यह गांव है, जो विकास की रफ्तार में काफी पिछड़ा हुआ है। यहां के निवासियों को बिल्कुल नहीं पता कि सदियों पहले यह जगह कैसी हुआ करती थी। नव वृंदावन मंदिर तक पहुंचने के लिए नाव के जरिए नदी पार करनी पड़ती है, जिसे कन्नड़ में टेप्पा कहा जाता है। यहां के लोगों का विश्वास है कि नव वृंदावन मंदिर के पत्थरों में जान है, इसलिए लोगों को इन्हें छूने की इजाजत नहीं है।</p>



<p>विठल स्वामी का मन्दिर<br>हम्पी में विठल स्वामी का मन्दिर सबसे ऊंचा है। यह विजयनगर के ऐश्वर्य तथा कलावैभव के चरमोत्कर्ष का द्योतक है। मंदिर के कल्याणमंडप की नक्काशी इतनी सूक्ष्म और सघन है कि यह देखते ही बनता है। मंदिर का भीतरी भाग 55 फुट लम्बा है। और इसके मध्य में ऊंची वेदिका बनी है। विऋल भगवान का रथ केवल एक ही पत्थर में से कटा हुआ है। मंदिर के निचले भाग में सर्वत्र नक्काशी की हुई है। लांगहस्र्ट के कथनानुसार-यद्यपि मंडप की छत कभी पूरी नहीं बनाई जा सकी थी और इसके स्तंभों में से अनेक को मुस्लिम आक्रमणकारियों ने नष्ट कर दिया, तो भी यह मन्दिर दक्षिण भारत का सर्वोत्कृष्ट मंदिर कहा जा सकता है। फग्र्युसन ने भी इस मंदिर में हुई नक्काशी की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। कहा जाता है कि पंढरपुर के विऋल भगवान इस मंदिर की विशालता देखकर यहां आकर फिर पंढरपुर चले गए थे।</p>



<p>विरुपाक्ष मन्दिर<br>विरुपाक्ष मन्दिर को पंपापटी मंदिर भी कहा जाता है, यह हेमकुटा पहाडियों के निचले हिस्से में स्थित है। हम्पी के कई आकर्षणों में से यह मुख्य है। 1509 में अपने अभिषेक के समय कृष्णदेव राय ने गोपुड़ा का निर्माण करवाया था। भगवान विठाला या भगवान विष्णु को यह मंदिर समर्पित है। 15वीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर बाजार क्षेत्र में स्थित है। यह नगर के सबसे प्राचीन स्मारकों में से एक है। मंदिर का शिखर जमीन से 50 मीटर ऊंचा है। मंदिर का संबंध विजयनगर काल से है। इस विशाल मंदिर के अंदर अनेक छोटे-छोटे मंदिर हैं जो विरूपाक्ष मंदिर से भी प्राचीन हैं। मंदिर के पूर्व में पत्थर का एक विशाल नंदी है जबकि दक्षिण की ओर भगवान गणेश की विशाल प्रतिमा है। यहां अर्ध सिंह और अर्ध मनुष्य की देह धारण किए नरसिंह की 6.7 मीटर ऊंची मूर्ति है।</p>



<p>पत्थर का रथ<br>किंवदंती है कि भगवान विष्णु ने इस जगह को अपने रहने के लिए कुछ अधिक ही बड़ा समझा और अपने घर वापस लौट गए। विरुपाक्ष मंदिर भूमिगत शिव मंदिर है। मंदिर का बड़ा हिस्सा पानी के अन्दर समाहित है, इसलिए वहां कोई नहीं जा सकता। बाहर के हिस्से के मुकाबले मंदिर के इस हिस्से का तापमान बहुत कम रहता है। विठाला मंदिर का मुख्य आकर्षण इसकी खम्बे वाली दीवारें और पत्थर का बना रथ है। इन्हें संगीतमय खंभे के नाम से जाना जाता है, क्योंकि प्यार से थपथपाने पर इनमें से संगीत निकलता है। पत्थर का बना रथ वास्तुकला का अद्भुत नमूना है। पत्थर को तराश कर इसमें मंदिर बनाया गया है, जो रथ के आकार में है। कहा जाता है कि इसके पहिये घूमते थे, लेकिन इन्हें बचाने के लिए सीमेंट का लेप लगा दिया गया है।</p>



<p>बडाव लिंग<br>पास में स्थित बडाव लिंग चारों ओर से पानी से घिरा है, क्योंकि इस मंदिर से ही नहर गुजरती है। मान्यता है कि हम्पी के एक गरीब निवासी ने प्रण लिया था कि यदि उसकी किस्मत चमक उठी तो वह शिवलिंग का निर्माण करवाया। बडाव का मतलब गरीब ही होता है।</p>



<p>लक्ष्मी नरसिम्हा मंदिर<br>हम्पी लक्ष्मी नरसिम्हा मंदिर या उग्र नरसिम्हा मंदिर बड़े चट्टानों से बना हुआ है, यह हम्पी की सबसे ऊंची मूर्ति है। यह करीब 6.7 मीटर ऊंची है। नरसिम्हा आदिशेष पर विराजमान हैं। असल में मूर्ति के एक घुटने पर लक्ष्मी जी की छोटी तस्वीर बनी हुई है, जो विजयनगर साम्राज्य पर आक्रमण के समय धूमिल हो गई।</p>



<p>रानी का स्नानागार<br>हम्पी में स्थित रानी का स्नानागार चारों ओर से बंद है। 15 वर्ग मीटर के इस स्नानागार में गैलरी, बरामदा और राजस्थानी बालकनी है। कभी इस स्नानागार में सुगंधित शीतल जल छोटी-सी झील से आता है, जो भूमिगत नाली के माध्यम से स्नानागार से जुड़ा हुआ था। यह स्नानागार चारों ओर से घिरा और ऊपर से खुला है।</p>



<p>हजारा राम मंदिर<br>हजारा राम मंदिर हम्पी के राजा का निजी मंदिर माना जाता था। मंदिर की भीतरी और बाहरी दीवारों पर बेहतरीन नक्काशी की गई है। बाहरी कमरों की छतों के ठीक नीचे बनी नक्काशी में हाथी, घोड़ा, नृत्य करती बालाओं और मार्च करती सेना की टुकडियों को दर्शाया गया है, जबकि भीतरी हिस्से में रामायण और देवताओं के दृश्य दिखाए गए हैं। इसमें असंख्य पंखों वाले गरुड़ को भी चित्रित किया गया है।</p>



<p>कमल महल<br>हम्पी में स्थित कमल के आकार का दो मंजिला महल और इसका मुंडेर महल पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। कमल महल हजारा राम मंदिर के समीप है। यह महल इन्डो-इस्लामिक शैली का मिश्रित रूप है। कहा जाता है कि रानी के महल के आसपास रहने वाली राजकीय परिवारों की महिलाएं आमोद-प्रमोद के लिए यहां आती थीं। महल के मेहराब बहुत आकर्षक हैं।</p>



<p>हाउस ऑफ विक्टरी<br>हाउस ऑफ विक्टरी स्थान विजयनगर के शासकों का आसन था। इसे कृष्णदेवराय के सम्मान में बनवाया गया जिन्होंने युद्ध में ओडिशा के राजाओं को पराजित किया था। वह हाउस ऑफ विक्टरी के विशाल सिंहासन पर बैठते थे और नौ दिवसीय दसारा पर्व को यहां से देखते थे।</p>



<p>संग्रहालय<br>कमलापुर में स्थित पुरातत्व विभाग का संग्रहालय बहुत-सी प्राचीन मूर्तियों और हस्तशिल्पों का सग्रंह है। इस क्षेत्र की समस्त हस्तशिल्पों को यहां देखा जा सकता है।</p>



<p>हाथीघर<br>हम्पी का हाथीघर जीनान क्षेत्र से सटा हुआ है। यह गुम्बदनुमा इमारत है जिसका इस्तेमाल राजकीय हाथियों के लिए किया जाता था। इसके प्रत्येक चेम्बर में एक साथ ग्यारह हाथी रह सकते थे। यह हिन्दू-मुस्लिम निर्माण कला का उत्तम नमूना है।</p>



<p>कब जाएं<br>अक्टूबर से मार्च की अवधि हम्पी जाने के लिए सबसे उत्तम मानी जाती है। हम्पी जाने के लिए हवाई, रेल और सड़क मार्ग को अपनी सुविधानुसार अपनाया जा सकता है। हम्पी जाने के लिए होस्पेट जाना पड़ता है। हैदराबाद से होस्पेट के लिए रेल है। होस्पेट से आगे 15 किलोमीटर की दूरी पर हम्पी है।</p>



<p>हवाई मार्ग<br>हम्पी से 77 किलोमीटर दूर बेल्लारी सबसे नजदीकी हवाई अड्डा है। बैंगलोर से बेल्लारी के लिए नियमित उड़ानों की व्यवस्था है। बेल्लारी से राज्य परिवहन की बसों और टैक्सी द्वारा हम्पी पहुंचा जा सकता है।</p>



<p>रेल मार्ग<br>हम्पी से 13 किलोमीटर दूर होस्पेट नजदीकी रेलवे स्टेशन है। यह रेलवे स्टेशन हुबली, बैंगलोर, गुंटाकल से जुड़ा हुआ है। होस्पेट से राज्य परिवहन की नियमित बसें हम्पी तक जाती हैं।</p>



<p>सड़क मार्ग<br>होस्पेट से सड़क मार्ग के द्वारा हम्पी पहुंचा जा सकता है। हम्पी बेलगांव से 190 किलोमीटर दूर बेंगलुरु से 350 किलोमीटर दूर, गोवा से 312 किलोमीटर दूर है।</p>



<p><strong><mark class="has-inline-color has-vivid-cyan-blue-color">दीदार ए हिन्द की रिपोर्ट</mark></strong></p>
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