लोहड़ी (13 जनवरी) पर विशेष: दिलों को जोड़ने वाला पर्व है लोहड़ी

लोहड़ी (13 जनवरी) पर विशेष: दिलों को जोड़ने वाला पर्व है लोहड़ी

-डॉ. संदीप सबलोक-

भारत ऋतुओं और त्योहारों का देश है, जहाँ हर उत्सव प्रकृति के परिवर्तन और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा है। उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब की सांस्कृतिक पहचान लोहड़ी का पर्व मात्र एक त्योहार नहीं, बल्कि यह कड़कड़ाती ठंड में जीवन की ऊष्मा, रबी की फसल की सुखद दस्तक और अन्याय के विरुद्ध वीरता के विजयघोष का संगम है। पौष माह की अंतिम रात्रि को जब अलाव की लपटें आकाश को चूमती हैं, तो वे केवल लकड़ियाँ नहीं जलतीं, बल्कि समाज की जड़ता और नकारात्मकता को भी भस्म करने का संदेश देती हैं।

दुल्ला भट्टी की शौर्य और न्याय की अमर गाथा
लोहड़ी के सांस्कृतिक ताने-बाने में दुल्ला भट्टी का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान पंजाब के वीर नायक दुल्ला भट्टी ने न केवल दमनकारी व्यवस्था को चुनौती दी, बल्कि नारी सम्मान की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। उस दौर में जब गरीब कन्याओं को गुलाम बाजार में बेचा जा रहा था, तब दुल्ला भट्टी ने सुंदरी और मुंदरी नामक दो अनाथ लड़कियों को जालिमों के चंगुल से मुक्त कराया।

इतिहास गवाह है कि दुल्ला भट्टी ने न केवल उन लड़कियों को सुरक्षा दी, बल्कि स्वयं उनका धर्म-पिता बनकर एक जंगल में आग जलाकर हिन्दू लड़कों से उनकी शादी करवाई और शगुन के रूप में उन्हें शक्कर दी। आज भी लोहड़ी के हर गीत में-सुंदर मुंदरिये हो! तेरा कौण विचारा हो! दुल्ला भट्टी वाला हो! गूँजता है, जो हमें याद दिलाता है कि वीरता का अर्थ ही मजलूमों की रक्षा करना है। आज भी ये पंक्तियाँ पंजाब के गाँवों में गूँजती हैं। यह कहानी हमें संदेश देती है कि लोहड़ी केवल खाने-पीने का पर्व नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने और नारी सम्मान की रक्षा का संकल्प भी है।

चरखा चढ़ाना और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता

परंपराओं की सोंधी खुशबू
लोहड़ी का पर्व पंजाब की कृषि परंपरा से गहरा नाता रखता है। यह रबी की फसल, विशेषकर गन्ने और सरसों की कटाई के समय आता है। इस दिन सूर्य देव और अग्नि देव की पूजा की जाती है। लोग अग्नि के चारों ओर परिक्रमा करते हुए उसमें मूँगफली, रेवड़ी, गजक, पॉपकॉर्न और तिल अर्पित करते हैं। इसे चर्खा चढ़ाना या आहुति देना कहा जाता है। मान्यता है कि अग्नि में अर्पित ये चीजें भविष्य की समृद्धि और अच्छी फसल की प्रार्थना का माध्यम हैं। रात के समय मक्की की रोटी और सरसों का साग इस पर्व के स्वाद को पूर्णता प्रदान करता है।

मान्यता है कि अग्नि में डाली गई ये वस्तुएँ अच्छी फसल के लिए ईश्वर को दिया गया धन्यवाद है। अग्नि को समर्पित किया जाने वाला तिल और गुड़ का मेल केवल स्वास्थ्यवर्धक नहीं, बल्कि संपन्नता का प्रतीक है। तिल के दाने की तरह समृद्धि बढ़ने की कामना की जाती है। लोहड़ी मनाने के लिए छोटे बच्चों की टोलियाँ घर-घर जाकर लोहड़ी माँगती हैं, जो सामाजिक सद्भाव और आपसी जुड़ाव को दर्शाता है। लोहड़ी के गीतों के बिना यह उत्सव अधूरा ही रहता है। छोटे बच्चों की टोलियाँ जब घर-घर जाकर दे माई लोहड़ी, तेरी जीवे जोड़ी गाती हैं, तो यह आपसी स्नेह और दुआओं का आदान-प्रदान होता है। इन गीतों में केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मिट्टी से जुड़ाव और बुजुर्गों के प्रति सम्मान झलकता है। लोहड़ी का त्यौहार हमारी कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था और गौरवशाली इतिहास का दर्पण है। यह हमें सिखाती है कि कैसे कड़ाके की ठंड (चुनौतियों) के बीच भी हंसी, नृत्य और अग्नि की गर्मी से जीवन को उत्सव बनाया जा सकता है।

नवजात और नव-विवाहितों की लोहड़ी: भावनात्मक परंपरा
जिस घर में नई बहू आई होती है, वहाँ लोहड़ी का आयोजन किसी उत्सव से कम नहीं होता। नई बहू सज-धज कर अग्नि पूजन करती है और बड़े-बुजुर्ग उसे सुख-सौभाग्य का आशीर्वाद देते हैं। यह परंपरा परिवार में नए सदस्य के प्रति प्रेम और स्वीकार्यता का प्रतीक है। इसी तरह घर में शिशु के आगमन के बाद आने वाली पहली लोहड़ी पर मंगण की रस्म होती है। रिश्तेदार और मित्र ढोल की थाप पर भांगड़ा और गिद्धा डालते हुए अपनी खुशियाँ साझा करते हैं। यह नवजात के दीर्घायु और स्वस्थ जीवन की कामना का सामूहिक अवसर होता है।

बदलता स्वरूप: अब बेटियों की भी लोहड़ी
परंपराओं की सबसे बड़ी खूबसूरती उनका समय के साथ ढलना है। पुराने समय में लोहड़ी मुख्य रूप से पुत्र रत्न की प्राप्ति पर मनाई जाती थी, लेकिन आज पंजाब की मिट्टी से एक नई क्रांति की गूँज सुनाई दे रही है। अब समाज में बेटियों के जन्म पर भी उतनी ही धूमधाम से लोहड़ी मनाई जा रही है। गाँवों और शहरों में अब बेटियों की लोहड़ी का आयोजन कर समाज को लैंगिक समानता का कड़ा संदेश दिया जा रहा है। यह बदलाव दुल्ला भट्टी के उस संकल्प को और भी मजबूत करता है जिसमें उन्होंने कन्याओं की रक्षा को सर्वोपरि माना था।

तनाव मुक्त जीवन और सामाजिक समरसता का अवसर
आज की तनावपूर्ण जीवनशैली में लोहड़ी मौज-मस्ती और उल्लास का वह झोंका है, जो लोगों को जोड़ने का काम करता है। ढोल की थाप पर भांगड़ा और गिद्दा केवल नृत्य नहीं, बल्कि मन के तनाव को दूर करने की एक सामूहिक थेरेपी है। गांव -मोहल्ले के लोग जब एक ही अलाव के चारों ओर बैठते हैं, तो पुराने गिले-शिकवे धुएँ की तरह उड़ जाते हैं और गुड़-तिल की मिठास रिश्तों में घुल जाती है। कनाडा, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में भी भारतीय मूल के लोग इसी भाईचारे और प्रेम के कारण सात समंदर पार भी अपनी मिट्टी की खुशबू को जीवित रखे हुए हैं।

पंजाब की जीवंत संस्कृति में लोहड़ी का त्योहार केवल एक तिथि नहीं, बल्कि खुशियों का वह महाकुंभ है जो रिश्तों की गर्माहट से सर्दियों की ठिठुरन को मात देता है। आज की भागमभाग भरी जिंदगी, जहाँ मनुष्य मशीनी उपकरणों के बीच तनावपूर्ण जीवन जीने को मजबूर है, वहाँ लोहड़ी जैसे पर्व हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने और आपसी भाईचारे के सूत्र में बंधने का अनमोल अवसर प्रदान करते हैं।

पंजाब की सीमाओं से निकलकर अब यह उत्सव
बंगलुरु के आईटी हब तक और असम के चाय बागानों से लेकर गुजरात के तटों तक, लोहड़ी की अग्नि जलती दिखती है। मध्य भारत, दक्षिण और पूर्वोत्तर राज्यों से होते हुए सात समंदर पार कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई देशों में भी भारतीय मूल के लोग ढोल की थाप पर लोहड़ी का जश्न मनाकर अपनी जड़ों का गौरव गान कर रहे हैं। विदेशों में बसे प्रवासी भारतीयों ने तो इसे एक इंटरनेशनल फेस्टिवल बना दिया है। हाड़ कंपा देने वाली ठंड में विदेशों की सड़कों पर जब भांगड़ा और गिद्दा पड़ता है, तो वह भारत की सांस्कृतिक विविधता और एकता का वैश्विक परिचय देता है। लोहड़ी का पर्व विश्वास, विजय और उल्लास का त्रिवेणी संगम है। यह हमें प्रकृति का सम्मान करना, वीरों को याद रखना और नई पीढ़ी का स्वागत करना सिखाता है। आइए, इस वर्ष लोहड़ी की इस पवित्र अग्नि में हम ईर्ष्या और भेदभाव की आहुति दें और प्रेम व मानवता के उजाले को चारों ओर फैलाएं। लोहड़ी केवल लकड़ियों का ढेर जलाना नहीं, बल्कि आपसी ईर्ष्या और तनाव को भस्म कर रिश्तों में गुड़-तिल जैसी मिठास घोलने का सामूहिक संकल्प है।

दीदार ए हिन्द की रीपोर्ट

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