नए वाहन कबाड़ नियम से ऑटो सेक्टर पर टूटने वाला है 25,000 करोड़ का वित्तीय पहाड़
नए वाहन कबाड़ नियम से ऑटो सेक्टर पर टूटने वाला है 25,000 करोड़ का वित्तीय पहाड़
नई दिल्ली, 05 मई। भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग को वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान अपने शुद्ध लाभ में लगभग 25,000 करोड़ रुपये की भारी चपत लगने की आशंका है। इसका मुख्य कारण पर्यावरण मंत्रालय द्वारा अधिसूचित ‘पर्यावरण संरक्षण (उपयोग समाप्त हो चुके वाहन) नियमावली 2025’ है। इस नए नियम के तहत वाहन निर्माताओं को उन वाहनों के लिए भी ‘पर्यावरण मुआवजा’ देना होगा, जिन्हें वे वर्षों पहले बाजार में बेच चुके हैं। ऑडिटरों की चेतावनी के बाद कंपनियों को अब अपनी बैलेंस शीट में इन भविष्य की देनदारियों के लिए भारी-भरकम राशि आरक्षित करनी पड़ रही है, जिससे उनके मौजूदा मुनाफे पर सीधा असर पड़ेगा।
विवाद की मुख्य जड़ इस अधिसूचना का ‘नियम 4 (6)’ है, जो विनिर्माताओं की ‘विस्तारित उत्पादक जिम्मेदारी’ (EPR) को उनके द्वारा अतीत में बेचे गए वाहनों पर भी लागू करता है। लेखा मानकों के अनुसार, कंपनियों को पिछले 20 वर्षों में बेचे गए निजी वाहनों और 15 वर्षों में बेचे गए वाणिज्यिक वाहनों के स्क्रैपिंग और ईपीआर प्रमाणपत्रों की अनुमानित लागत के लिए अभी से वित्तीय प्रावधान करने होंगे। उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही किसी कंपनी का कारोबार बंद करने का कोई इरादा न हो, फिर भी नियमों की तकनीकी व्याख्या के कारण करोड़ों की धनराशि खातों में फंस जाएगी, जिससे निवेश और विस्तार योजनाओं में बाधा आएगी।
वाहन विनिर्माताओं के प्रमुख संगठन ‘सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स’ (SIAM) ने इस गंभीर विषय को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के समक्ष उठाया है। उद्योग जगत का तर्क है कि एक साथ इतनी बड़ी राशि का प्रावधान करने से पूरे ऑटो सेक्टर की विकास दर प्रभावित हो सकती है। कंपनियों का मानना है कि ईपीआर के नियमों को अधिक व्यावहारिक बनाने की आवश्यकता है ताकि पर्यावरण संरक्षण के लक्ष्य भी पूरे हों और उद्योग की वित्तीय सेहत भी खराब न हो। फिलहाल, इस नियम के कारण ऑटो कंपनियों के शेयर और भविष्य की कमाई के अनुमानों पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं।
दीदार ए हिन्द की रीपोर्ट